मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

सुनंदा की कहानी- डॉक्टर सुनंदा की जुबानी


वह,

उष्मा है,
,
ऊर्जा है,
,
प्रकृति है,

क्योंकि

वही तो,

आधी दुनियाँ,

और

पूरी स्त्री है |

प्रतिभा पैदा नहीं होती प्रतिभा बनाई जाती है | अगर आपको सारा आकाश चाहिए तो आपके हौसले बुलंद होने चाहिए | आंधी तूफान से टकराने का जज्बा होना चाहिए , सपने आपके मुट्ठी में कैद होने चाहिए | कुछ ऐसे ही बुलंद जज्बे की कहानी है हैदराबाद की डाक्टर सुनंदा |
 डाक्टर सुनंदा का जन्म कर्नाटक के धारवाड़ के आसपास सिरसिंगी नामक गाँव में हुआ | गाँव की सोंधी मिट्टी तथा नानी के छत्रछाया में इनका बचपन बीता | इनका बचपन सामान्य बच्चों जैसा ही था, कभी-कभी तो वे स्वयं मजदूरों के साथ खेतों में काम में लग जाती थीं, काम करते हुए उनसे किस्से-कहानियाँ सुना  करती थीं | इनका बचपन यह दर्शाता है की यह बचपन से ही मेहनतशील प्रवृति की थीं | सुनंदा का परिवार लड़कियों के लिए न तो उदारवादी विचारधारा का परिचायक था और न ही संकुचित मानसिकता का पोषक | यहाँ यह कहना उचित होगा की इनका परिवार परम्पराओं तथा वर्जनाओं को ढोनेवाला परिवार था |  परिवार ने इन्हें घर से बाहर घुमने की आजादी नहीं दी वहीं इनके भाइयों पर कोई रोक-टोक नहीं था |  सुनंदा को यह बात नागवार गुजरती थी और वे अपने परिवार से तथा बड़े भाई से लड़ पड़ती थीं | इससे एक बात तो साफ होता है कि सुनंदा लैंगिक भेदभाव (gender discrimination) के खिलाफ थीं | आठवीं कक्षा में इनके माता-पिता ने इन्हें पहली साइकिल दिलवाई | यह सुनंदा के जीत की पहली सीढ़ी थी | मानो इस साइकिल ने सुनंदा की शक्ति को गति प्रदान कर दी सुनंदा ने पीछे पलटकर नहीं देखा | आप गाँव की पहली ऐसी लड़की थीं जिसने लूना चलाना सीखा | “कहते हैं न पूत का लक्षण पालना में ही दिख जाता है” हालांकि यह कहावत मर्दवादी मानसिकता का द्योतक है | सुनंदा के लिए यह कहना उचित होगा कि  “पुत्री के लक्षण पालने में ही दिख जाते हैं”| इन्हीं दिनों इनका रुझान handicraft के तरफ बढ़ा | इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद इन्होंने ग्रेजुएशन गृहविज्ञान (home science) से किया |
  1993 में सुनंदा जब M.Sc कर रही थीं उसी दौरान इनकी शादी हो गयी | सुनंदा ने 1994 पोस्टग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की 1995 में बेटा प्रतीक का जन्म हुआ | 1996 में इन्होंने AICRP नामक NGO ज्वाइन किया | यहाँ आपकी पहली तनख्वाह 1500/- थी | साथ ही आपने नेचुरल राईस (NATURAL RICE ) के लिए भी काम करना शुरू किया | आपकी इस उपलब्धि के लिए ICAR ने 2001 में आपको राष्टीय पुरस्कार से सम्मानित किया | सुनंदा इसका श्रेय अपनी मार्गदर्शिका (mentor) डाक्टर गीता महाले को देती हैं | डाक्टर गीता महाले उस समय धारवाड़ कर्नाटक में एग्रीकल्चर विभाग में प्रोफेसर थीं | सुनंदा ने मन में ठान लिया था की इन्हें अपनी एक अलग पहचान बनानी है | वर्ष 2004 में सुनंदा का चयन UNICEF के ICDS कार्यक्रम के अंतर्गत WOMEN AND CHILD  DEVLOPMENT विभाग में बतौर सुपरवाईजर पद के लिए हुआ | हालांकि इनकी यह नियुकित अस्थायी probationary थी | सुनंदा स्वभाव के विषय में पाठकों को यहाँ यह बता देना उचित होगा कि बचपन से ही इन्हें ईमानदारी, सच्चाई तथा निर्भीकता बहुत पसंद था | दुर्भाग्यवश यहाँ का वातावरण बेईमान तथा बीमार मानसिकता वाले लोगों से भरा पड़ा हुआ था | सुनंदा का मन इन सबसे काफी आहत हुआ | लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था | इधर परिस्थितियां भी कुछ विपरीत बन रही थी साथ ही पति का तबादला एक शहर से दूसरे शहर होने के कारण बच्चों की शिक्षा-दीक्षा बाधित हो रही थी | जब सुनंदा की नौकरी स्थायी होने वाली थी तब इन्होंने परिवार को प्राथमिकता देते हुए दुखी मन से नौकरी से इस्तीफा देने का मन बना लिया | जब इस विषय पर इन्होंने अपने पति तथा पिता से चर्चा की तो दोनों ने कहा जो आप उचित समझे करें | किन्तु पिता यह चाहते थे की आप परिवार को प्राथमिकता दें | पिता के एक पारिवारिक मित्र ने उन्हें इस बात के लिए काफी भला-बुरा कहा | दुखी मन से आप अपने  दो बच्चों तथा दो सूटकेस के साथ हैदराबाद आ गई | बच्चे छोटे थे ये समय काफी कठिन था आपके लिए भाषाई समस्या से जूझना पड़ा आपको तेलुगू तथा हिन्दी दोनों ही भाषा आपको नहीं आती थी | फिर आपने तेलुगू का अध्ययन किया | और आपके बच्चे तेलुगू में अपने कक्षाओं में अव्वल आने लगे | इसी दौरान आप पार्ट टाइम नौकरी भी करती रही | यहाँ आपको लोकल तथा नॉन लोकल की समस्याओं से भी जूझना पड़ा | इन सबसे आपका मनोबल काफी हद तक बढ़ा | इसी दौरान TISCO से आपने मैन्युअल तथा कंप्यूटर के द्वारा  textile designe तथा weaver के section का ट्रेनिंग लिया | पुनः आपने textile के क्षेत्र में डाक्टरेट करने का निर्णय लिया | पिता आपके इस फैसले से काफी खुश थे | लेकिन माताजी काफी नाराज हुई | उन्होंने आपसे कहा क्यों सबको मुसीबत में डाल रही हो ? बेटा ने हंसते हुए कहा हमेशा मुझे आप पढो-पढो बोलते हो न जब आप खुद पढोगे तो आपको पता चलेगा की पढ़ाई कितनी मुश्किल है इसलिए आप पढ़ो | घर का सारा काम खत्म करने के बाद आप रात में बैठकर शोधप्रबंध (thesis) लिखती थीं |
कहतें हैं न अगर आप नेक काम करोगे तो राह में रोड़े तो आएँगे ही | यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ | विश्वविद्यालय ने अंदुरुनी राजनीति के वजह से आपको शोध कार्य के लिए भत्ता (stipen) देने से मना कर दिया | लेकिन सुनंदा कहाँ रुकने वाली थी | आपके पति ने आपके शोधकार्य (research work) का खर्चा वहन किया और आपका शोधकार्य निर्विघ्न चलता रहा | लेकिन ईश्वर को तो कुछ और ही मंजूर था इसी दौरान आपके ससुर का स्वर्गवास हो गया | सुनंदा को यह कमी हमेशा खलती है की आज उसके ससुर ज़िंदा होते तो उसकी कामयाबी पर सबसे ज्यादा खुश होते गौरव महसूस करते | मानद डाक्टरेट की उपाधी आज आपके हाथ में है | आप अपने गाँव की पहली ऐसी महिला हैं जिसने शिक्षा के क्षेत्र में डाक्टरेट की उपाधि हासिल की | हैंडलूम के क्षेत्र में आप गोल्लबामा with natural die पर आप काम कर रही हैं | आपका पहली प्रदर्शनी (exhibition) people plaza में हुआ | मुख्यमंत्री के सुपुत्र K.T.R जो की स्वयं मंत्री हैं ने आपके काम की तारीफ की | आपके बुनकरों ने और कठिन मेहनत करना शुरू किया | इस साल 7 अगस्त आपके लिए यादगार दिन था आपके मार्गदर्शिका (mentor) ने आपके फाइव कलेक्शन को देखा और आपके काम की काफी सराहना की | आज आपके पास अपना चार लूम है और पुरे जोश के साथ आप और आपके बुनकर काम कर रहें हैं | आपका मानना है की जो कुछ भी होता है वह आपके अच्छे के लिए ही होता है | आपकी अभिरुचि समाज सेवा के क्षेत्र में भी है आप महिलाओं का समूह बनाना चाहती हैं तथा बुनकरों के एक गाँव को गोद लेना चाहती हैं |  ईश्वर आपके इस नेक काम में सफलता प्रदान करें | आप यशस्वी हों समस्त हिन्दी जगत की ओर से आपको अनंत शुभकामनाएं |

 डा. अर्पणा दीप्ति

रविवार, 10 दिसंबर 2017

1.सुनो ! औरतें केवल देह नहीं होती -----

औरतें केवल देह नहीं होती 
इसी देह में इक कोख होती है 

जो तुम सबका पहला घर है 
अपने रक्त मांस से पोस कर जनमती है तुम्हे 
और तुम ईंट पत्थरों का घर बनाने के बाद 
भूल जाते हो अपना पहला प्रश्रय 
गाली देते हो उसी कोख को जहाँ ली थी तुमने पहली सांस 
तुम्हारी माँ बहनें बेटियां भी तो एक देह ही है 
ये सारी औरतें देह धरम निभाते निभाते भूल गई थी अपना अस्तित्व 
और मात्र देह बन कर रह गई थी --
चल रही थी दुनिया ये सारी सृष्टि एक भ्रम में जीते हुये 
और चलती ही रहती न जाने कब तक --
पर तुमने जगा दिया बार बार थूक कर इन्हें लज्जित कर 
औरत तुम सिर्फ एक देह हो सौ दिन की हो या सौ साल की 
आज फिर सृष्टि के बड़े आंगन में औरतों की महापंचायत जुटी 
सब ने समवेत स्वर में कहा -- 
यदि हम देह है तुम्हारे लिये तो तुम भी तो देह ही हो 
अंतर इतना है तुम कह देते हो हम कहते नहीं 
वरना तुम खड़े भी नहीं हो सकते किसी औरत के सामने -
अचानक गूंज उठा दिगदिगान्तर उनके ठहाकों से -
जिनसे प्रतिध्वनित हो रहा था बस एक ही स्वर 
यदि हम मात्र देह है तो तुम भी तो देह ही हो 
--- अर्पणा दीप्ति 

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

पद्मावती प्रकरण बनाम स्त्री अस्मिता

आजकल स्त्री अस्मिता के नाम पर चारों तरफ हंगामा बरप्पा हुआ है | राजस्थान में भंवरी देवी के साथ बर्बर अमानुषिक व्यवहार अपराध क्या था भंवरी का बस इतना सा की उसने दो सवर्ण बच्चियों का बाल-विवाह रोकने का प्रयास किया गांव के गुर्ज्जरो ने बर्बरता की सारी सीमा लांघ दी | तब भी राजस्थान में यही सरकार थी | नेताओं ने कहा ये औरत झूठ बोल रही है........ तब ये लोग क्यों नहीं खड़े हुए भंवरी के पक्ष में, अपराधियों को दंड क्यों नहीं दिलवाया ? और कुछ न सही तो कम से कम उस घृणित बलात्कारियों के लिए एक फतवा ही जारी कर देते उनका भी ‘नाक काट देने का’ | लेकिन कुछ भी नहीं हुआ दमन किया स्त्री का और अपराधी था पुरुष |


वस्तुस्थिति बिलकुल नहीं बदली आज भी वही हो रहा है | सात सौ साल पुरानी कहानी को मुद्दा बनाकर हंगामा फैला रखा है | स्त्री की नाक काटने के लिए फतवा जारी कर दिया | वाह जज भी आप वकील भी आप और गवाह भी आप फिर सजा तो मिलेगी स्त्री को | इन्हें 15-20 साल से अपनी अस्मिता और सम्मान की लड़ाई लड़ रही स्त्रियाँ क्यों नहीं दिखाई देती जो आज तक इन्साफ की आस लगाए बैठी हुई हैं | स्त्री तो स्त्री है चाहे वह महरानी हो या दलित भंवरी देवी | मान-सम्मान तो सबका बराबर है | 

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014




जीवन की कटुताएँ

दुर्घटनाओं का गरल पिया 
स्थितियों का विष ! कितना तीखा
जीवन की कटुताएँ तीखी
इनके सम्मुख विष भी फीका
    
उफ्फ ! मन है या यह रणस्थली
घनघोर युद्ध, कैसा स्वर है
यह शोर कहाँ है ? किधर कहाँ ?
मन के भीतर या बाहर है ?

संकल्पों का वह सत्य आज मर चुका,
सत्य का यह पार्थिव स्वरूप जल जाने दो
यह सत्य अरे जो शाश्वत था किन्तु इसको 
तन और गलाने दो, कुन्दन बन जाने दो।

सन्देह नपुंसकता की एक घोषणा है,
संदेह दृष्टि का दोष,
संदेह दृष्टि का जाल नये बुन-बुनकर 
किम्वदंतियाँ नित नई गढ़ता रहता।

लांछन बनकर कहीं सिर चढ़ा तो 
कहीं पुछल्ला बन लीक पीटता रहता है
बिच्छु सा कहीं डंक से यह छू लेता
उफ्फ- पीड़ा से सारा तन दहता है।

उजला जो चरित मिला उस पर ही दोष मढ़ा
संदिग्ध अक्षरों से लिख डाले लेख नये
कुछ नई भ्रान्तियाँ देने को यह फुसफुसा रहा
इसके स्वर भी संदिग्ध !

संदेह तुम्हारा अपना हो या जनता का
संदेह अग्नि में धू-धू-धू-धू जलती हूँ मैं
लो राम अब चलती हूँ मैं

बुधवार, 11 सितंबर 2013

बेटी के नाम माँ की पहली चिट्ठी



पुराने कागजो में मिली आज -------------
----------बरसों पहले मुझे ससुराल में 
लिखी माँ की पहली चिट्ठी ------------
---------कितनी नसीहतें है इसमें 
कुछ प्यार भरी धमकी भी ------------
------------ठीक से रहना ससुराल है तेरा 
जोर से मत हंसना -धम धम कर के भाग दौड़ न करना 
पता नहीं तुझे कब अक्ल आएगी समझती ही नहीं 
हे भगवान ये पगली गुड़िया भी छुपा कर ले गई अपनी 
अच्छा सुन! उसे निकाल कर खेलना मत 
वरना सब तेरे बाबुजी और माँ को कहेंगे --------
कुछ तौर-तरीका ही नहीं सिखाया इसकी माँ ने ------
कोई शिकायत न आये वहाँ से समझी ?
रोज सुबह उठ कर बड़ों के पैर जरुर छूना 
भूलना मत सबके पैर छूना समझ रही है न ?
तुझे समझया था -- मुझे याद आया माँ ने 
विदाई के समय फुसफुसाकर कान में कहा था कुछ 
फिर मुझे हंसी आ गई ---- सब याद करके 
जब मैने तुनक कर कहा था क्या इस लड़के का भी 
न नहीं बिलकुल नहीं छूना मुझे! नहीं करुँगी जाओ 
माँ का चेहरा पीला पड़ गया, न जाने क्या करेगी ये लड़की
कोई अक्ल नहीं, सहूर भी नहीं इसे मना किया था
मत करो इसकी शादी अभी से -----
हाथ में कांपती हुई माँ की चिट्ठी का 
ये पीला जर्जर कागज़ ऎसा प्रतीत हो रहा है
मानो मेरी बीमार माँ का कमजोर चेहरा हो 
जो आज भी पीला पड़ जाता है मेरी चिंता में 
चिट्ठी के पीले पड़े कागज़ में दो बूंद आंसूओं के निशान हैं 
उन्हें छुआ वो अभी भी नम है ----- 
बस दो बूंद ढलक गई मेरी आँखों से --
बुदबुदा उठी ओंठो में इक हूक सी उठी कलेज़े में 
माँ इस बार जल्दी आउंगी मैं -तुम्हारी गोद में सर रख कर 
रोना है मुझे -- ढेर सारी बातें करनी है 
और वह गुड़िया उसकी सिलाई उघर गई है 
फिर भी सहेज़ रखा है तुमने बनाई थी न 
इस बार आउंगी उसे फिर से सी देना 
तुम सी दोगी न माँ --मै फिर से जी लुंगी 
अपना अधूरा छूटा बचपन ----- !!
--------------------- DIPTI

शनिवार, 7 सितंबर 2013

पिता की पगड़ी

पिता की पगड़ी / कपड़े की नहीं होती है
बेटी के देह की बनी होती है। 
जहाँ जहाँ बेटी जाती है 
पिता की पगड़ी साथ जाती है। 
पगड़ी का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध मात्र बेटी से है 
बेटे को उससे कोई सहानुभूति नहीं
 न ही अन्दर से
 और न बाहर से।।

बेटा चाहे कितना ही 
काला होकर आता है, 
पगड़ी की सफेदी 
बेदाग रहती है।
वह तो बेटी है कि तिनका हिला नहीं
पगड़ी पहले मैली हो जाती है।।

इसलिए तो हर बाप अपनी बेटी से कहता है 
बेटी पगड़ी की लाज रखना,
भाई से होड़ मत करना
वह तो वंश बेल है। 
अमर बेल की तरह 
उसी से घर की शोभा है।।

बेटियां बेजुबान रहें 
इसी में वे चरित्रवान हैं। 
पगड़ी कभी नहीं फटती है 
बेटियां मिटती हैं।।

पगड़ी की सुरक्षा के लिए 
कम पड़ती हैं हजारों बेटियां। 
और यह अंतहीन सिलसिला......
चलता ही रहता है अनवरत। 
पिता सुख की नींद सोता है
बेटियाँ पगड़ी की लाज रखती हैं। 

फिर भी वे पराई कही जाती हैं
क्योंकि पहनते हैं बेटे पगड़ी का ताज,
रखती हैं बेटियाँ पगड़ी की लाज ॥





प्रेम के लिए देह नहीं, देह के लिए प्रेम ज़रूरी!


मैत्रेयी पुष्पा का 2004 में प्रकाशित उपन्यास ''कही ईसुरी फाग'' स्त्री विमर्श के दृष्टिकोण से ध्यान आकर्षित करने वाला महत्वपूर्ण उपन्यास है । कथावस्तु को ऋतु नामक शोधार्थी द्वारा लोक कवि ईसुरी तथा रजऊ की प्रेम कथा पर आधारित शोध के बहाने नई तकनीक से विकसित किया गया है । इस शोध को इसलिए अस्वीकृत कर दिया जाता है क्योंकि रिसर्च गाइड प्रवर पी. के. पांडेय की दृष्टि में ऋतु ने जो कुछ ईसुरी पर लिखा था , वह न शास्त्र सम्मत था , न अनुसंधान की ज़रूरतें पूरी करता था । उसे वे शुद्ध बकवास बताते हैं क्योंकि वह लोक था । लोक में कोई एक गाइड नहीं होता । लोक उस बीहड़ जंगल की तरह होता है जहाँ अनेक गाइड होते हैं , जो जहाँ तक रास्ता बता दे , वही गाइड का रूप ले लेता है। ऋतु भी ईसुरी - रजऊ की प्रेम गाथा के ऎसॆ ‍बीहड़ों के सम्मोहन का शिकार होती है -


 "बड़ा खतरनाक होता है, जंगलों , पहाड़ों और समुद्र का आदिम सम्मोहन .....हम बार-बार उधर भागते हैं किसी अज्ञात के दर्शन के लिए ।''

’कही ईसुरी फाग’ भी ऋतु के ऎसे भटकावों की दुस्साहसिक कहानी है । इस उपन्यास का नायक ईसुरी है,लेकिन कहानी रजऊ की है - प्यार की रासायनिक प्रक्रियाओं की कहानी जहाँ ईसुरी और रजऊ के रास्ते बिल्कुल विपरीत दिशा में जाते हैं। प्यार जहाँ उनको बल देता है,तो तोड़ता भी है। शास्त्रीय भाषा में कहा जाए तो ईसुरी शुद्ध लंपट कवि है, उसकी अधिकांश फागें शृंगार  काव्य की मर्यादा का अतिक्रमण करते हुए शारीरिक आमंत्रणों  का उत्सवीकरण है।

ऋतु की शोध यात्रा माधव के साथ ओरछा गाँव से शुरू  होती है । लेकिन यह क्या, कि सत्तरह गाँवों की खाक छानकर रजऊ की खोज में पहुँची ऋतु को लोग ईसुरी का पता तो देते हैं मगर रजऊ के बारे में जानकारी देना इसलिए बुरा मानते हैं चूँकि उनकी नजर में रजऊ बदचलन है । लोग विद्रूप सा चेहरा बनाकर कहते हैं , आजकल पढ़ाई में लुचियायी फागें पढ़ाई जाती हैं! यह गाँव ऋतु की  बुआ का गाँव था । ऋतु की बदनामी बुआ के परिवार की बदनामी थी । ऋतु को अपने ऊपर  झुँझलाहट होती है कि मैंने रजऊ को अपने शोध का विषय क्यों बनाया?
 "क्योंकि रजऊ के स्त्रीत्व पर कोई विचार नहीं करता, उसके रूप  में मेरी देह का अक्स लोगों के सामने फैल जाता है ।"(पृ.सं-14)
ऋतु के शोध का अगले  पड़ाव का संबंध  सरस्वती देवी की नाटक मडंली में  फाग गाने वाले ईसुरी तथा धीर पंडा से है। रामलीला में तड़का लगाने के लिए ईसुरी के फागों की छौंक ! यह क्या,  तभी एक बूढ़ी औरत मटमैली सफेद धोती पहने माथे तक घूँघट ओढ़े भीड़ को चीरती हुई मंच पर आ जाती है । उसकी कौड़ी सी दो आँखो में विक्षोभ का तूफ़ान  उठ रहा था-
 " मानो फूलनदेवी की बूढ़ी  अवतार हो । काकी उद्धत  स्वर में चिल्लाई  -’ओ नासपरे ईसुरी लुच्चा तोय महामाई ले जावे ।’ काकी भूखी शेरनी की तरह ईसुरी की  तरफ बढ़ने लगी । मुँह से शब्द नहीं आग के गोले निकल रहे थे । टूटे दाँतों के फाँक से हवा नहीं तपती आँधी टूट रही थी । काकी ने चिल्लाकर कहा, हमारी बहू की जिन्दगानी बर्बाद करके तुम इधर फगनौटा गा रहे हो। अब तो तुम्हारे जीभ पर जरत लुघरा धरे बिना नहीं जाएंगे।"(पृ.सं.-21)
दर्शक उठकर खड़े हो जाते हैं | रघु नगड़िया वाला आकर कहता है -
" भाइयों अब तक आपने फागें सुनी और अब फागें नाटक में प्रवेश कर गईं  -’लीला देखे रजऊ लीला’ काकी रघु से कहती है-’अपनी मतारी की लीला दिखा’ काकी कहती है -’आज तो हम ईसुरी राच्छस के छाती का रक्त पीके रहेंगे । धीर का करेजा चबा जाएँगे।" (पृ.सं.-22) 
काकी के कोप का आधार ? बात उन दिनों की है जब काकी का बेटा प्रताप छतरपुर रहता था और उसकी नवयुवा बहू रज्जो की उम्र बीस वर्ष से कम थी । सुंदर इतनी कि जहाँ खड़ी हो जाए, वही जगह खिल उठे । वह अपूर्व सुंदरी थी या नहीं , मगर ईसुरी के अनुराग में उसकी न जाने कितनी छवियाँ छिपी थीं ।

काकी के घर उन दिनों पंडितों के हिसाब से शनि ग्रह की  साढ़े साती लगी थी; नहीं तो मेडकी  के ईसुरी और धीर पंडा माधोपुरा की ओर न आते और रज्जो फगवारे को अनमोल निधि के रूप में न मिलती । घूंघटवाली रज्जो से अब तक ईसुरी का जितना भी परिचय हुआ वह लुकते छिपते चंद्र्मा से या राह चलते-निकलते आँखों की बिजलियों से । ऎसे ही बेध्यानी में ईसुरी एक दिन ठोकर खा गए और गिरे भी तो कहाँ; रजऊ की  गली में ! ईसुरी ने अपनी ओर से रज्जो को नाम दिया - रजऊ ।

रज्जो को घूंघट से देखने की दिलकश अदा अब ईसुरी को सजा लगने लगी ।  वे सोचते - यह सब मुसलमानों के आने से हुआ । वे अपनी औरत को बुर्का पहनाने लगे । हिंदुओं ने सोचा, हमारी औरत उघड़ी काहे रहे ? मुसलमानों के परदे   को अपना लिया पर अंग्रेजों का  खुलापन उन्हें काटने दौड़ा ।

इधर प्रताप छतरपुर में मिडिल की पढ़ाई  पूरी  न कर पाने के कारण  अपने गाँव वापस नहीं आ पाता है | इस खबर से उसकी बूढ़ी माँ एवं  पत्नी उदास हो जाती हैं । सास बहू को समझाती  - ऎसे उदास होने से काम नहीं चलेगा । स्थिति  को पलटने के लिए सास ने दूसरा नुस्खा अपनाया । फाग के पकवानों की तैयारी पूरी है,फगवारे को खिलाकर कुछ पुन्न-धरम कर लेते हैं। रज्जो के चेहरे पर हुलास छा जाता है। सास मन-ही-मन जल-भुनकर गाली भरा श्राप ईसुरी को देना शुरू  करती है।

सास रज्जो को समझाती है। पूरा मोहल्ला होली में आग नहीं लगा रहा बल्कि हमारे घर में आग लग रही है। प्रताप का चचेरा भाई रामदास भी रज्जो और फगवारे के प्रसंग को लेकर आगबबूला होता है। सास बदनामी से बचने के लिए रज्जो को मायके जाने की सलाह देती है। लेकिन रज्जो मायके जाने से साफ मना कर देती है। अपनापन उडेलते हुए सास से कहती है  -
 "हमारे सिवा तुम्हारा यहाँ है कौन ? तुम्हारी देखभाल कौन करेगा । गाँव के लुच्चे लोगों की बात छोड़ दो ।" (पृ.सं.-45)
सास रज्जो का विश्वास कर लेती है और कहती है-
"मोरी पुतरिया,भगवान राम भी कान के कच्चे थे, मेरा बेटा तो मनुष्य है।" (पृ.सं.-46)
सास रज्जो को अपनी आपबीती सुनाती है कि किस प्रकार फगवारा  उसके लिए फाग गा रहा था और उसी दिन प्रताप के दददा उसे लिवाने आए थे । उन्होंने सुन लिया था ।
''मर्द की चाल और मर्द की नजर का मरम मर्द से ज्यादा कौन समझे ! अपना झोला उठाया और चुपचाप वापस चले गए । फिर खबर आई -अपनी बदचलन बेटी को अपने पास रखो, ऎसी सत्तरह जोरू  मुझे मिल जाएगी ! फिर क्या था माँ ने डंडों से मेरी पिटाई कर डाली तथा जबरदस्ती नाऊ (हजाम) के संग सासरे भेज दिया । कहा कि नदी या ताल में ढकेल देना, अकेले हमारे देहरी न चढ़ाना  । नहीं तो इसके सासरे वालों से कहना- खुद ही कुँआ बाबरी में धक्का दे दें । हम तो कन्यादान कर चुकें हैं । ससुराल वालों ने तो अपना लिया लेकिन पिरताप के दद्दा  का कोप बढ़ता तो हथेली पर खटिया का पाया धर देते , अपने पाया के उपर बैठ जाते । डर और दर्द के मारे मैं सफेद तो हो जाती मगर रोती नहीं । यह सोचकर जिन्दा रही अपना ही आदमी है जिसका बोझ हम हथेली पर सह रहें हैं। जनी बच्चे का बोझ तो गरभ में सहती है जिंदगानी तो बोझ वजन के हवाले रहनी है ; सो आदत डाल लिया ।"(पृ.सं.48)
रज्जो सास के हाथों पर घाव के भयानक निशान देखकर काँप उठती है।

सास ईसुरी तथा पंडा को खाना खिलाते हुए वचन लेना चाहती है कि रज्जो के नाम पर अब वे फाग नहीं गाएँगे । एकाएक फगवारे खाना छोड़कर उठ जाते हैं। ईसुरी इंकार करते हुए कहता है -
 "काकी हम जिस रजऊ का नाम फाग के संग लगाते हैं वह न तो प्रताप की दुल्हन है न तुम्हारी बहू?"(पृ.सं.53) 
ऋतु के श्रीवास्तव अंकल ऋतु को सरस्वती देवी का पता देते हुए चिरगाँव जाने को कहते हैं और बताते हैं कि हिम्मती औरत है, समाज सेवा का काम करती है, लोकनाट्य में रुचि है और हर साल मंडली जोड़ती है।


सरस्वती देवी ने ऋतु तथा माधव को अपने जीवन का किस्सा बताया ।
 "विधवा हुई , मेरे संसार में अंधेरा छा गया । मगर जिंदगी ने बता दिया कि पति न रहने के बाद औरतों को अपने बारे में सोचना पड़ता है। अपने लिए फैसले लेने पड़ते हैं और फैसला ले लिया । फाग मंडली एक कुलीन विधवा बनाए , परिवार वाले यह बात कैसे सहन करते। कभी जलते पेट्रोमेक्स तोड़े गए तो कभी फगवारे को भाँग पिला दी गई । सरस्वती देवी कहती हैं -पर मैं हार नहीं मानने वाली थी , दूसरे फगवारे को खोजती फिरती क्योंकि मेरे भीतर का हिस्सा रजऊ ने खोजकर कब्जा कर लिया था । फागों में उसका वर्णन सुनकर सोचती थी कि औरत में इतना साहस होता है कि उसके पसीने की बूँद गिरे तो रेगिस्तान में हरियाली छा जाए, आँखों से आँसू गिरे तो बेलों पर फूल खिल जाएँ  । रजऊ जैसा नगीना फागों में न टँका होता तो ईसुरी को कौन पूछता ।’ " (पृ.सं.-57)
इधर मामा के छतरपुर वाले घर को आधुनिक नरक कहने वाला माधव उधर ही जा रहा था । लेकिन वहाँ के भ्रष्ट माहौल को देखकर वह वापस ऋतु के पास लौट आता है । जहाँ ऋतु के मन में माधव के प्रति प्रेम का अंकुर फूटता है वहीं मामा के घर जाने पर क्रोध भी आता है । 

सरस्वती देवी ऋतु को मीरा की कहानी सुनाती है - किस प्रकार आँगनवाड़ी के क्षेत्र में मीरा महिला सशक्तीकरण की मशाल  अपने हाथ में लेती है । गाँव की सीधी-सादी तथा ससुरालवालों द्वारा पागल समझी जाने वाली मीरा को पढ़ने की बीमारी लग चुकी थी । गाँव की सभ्यता को दरकिनार करते हुए मीरा मोटरसाइकिल चलाने का निर्णय लेती है।

मीरा सिंह की  मोटरसाइकिल पर ऋतु बसारी पहुँचती है, 90 वर्ष की बऊ से मिलने । गौना करके आई रज्जो के अपूर्व रूप  का वर्णन बऊ करती है। कहती है -
"प्रताप की बहू रूप  की नगीना, नगीने के नशे में मदहोश प्रताप।"(पृ.सं.-69)
 इधर प्रताप छुट्टी बिताकर छतरपुर वापस चला जाता है, उधर ईसुरी के चातक नयन रज्जो की बाट न जाने कब से देख रहे थे । एक ओर पराई औरत की आशिकी और फागों में फिर-फिर रजऊ का नाम लगाने वाले  ईसुरी के  यश की गाथा राजा रजवाड़ों तक पहुँची । दूसरी ओर सुंदर बहू की बदकारी गाँववालों से होते हुए प्रताप के कानों तक पहुँची । प्रताप पहले फगवारे को समझाता है, पैर पड़ता है, लेकिन सब बेकार। अंत में उसने फगवारे की पिटाई कर दी । प्रताप एक कठोर निर्णय लेता है वह रज्जो का मुँह कभी नहीं देखेगा । वह वापस छतरपुर जाकर अंग्रेजों की  पलटन में भर्ती हो जाता है । मर्द चले जाते हैं , घर की रौनक बाँध ले जाते हैं । प्रताप का विमुख होना घर की तबाही बन गया  ।

यह बात तो दीगर थी कि रज्जो ने ईसुरी को दिल से चाहा था , लेकिन यह क्या कि  फगवारे तमोलिन की  बहू के नाम पर फाग गा रहे हैं । जोगन बनी रज्जो आहत होती है । सास रज्जो की पहरेदारी करती है, रज्जो फगवारे से न मिल पाए । तभी पिरभू आकर खबर देता है -"ईसुरी जा रहे हैं आपसे आखिरी बार मिलना चाहते हैं ।" सास की परवाह किए बगैर  रज्जो रात के आखिरी पहर हाथ में दिवला जलाए प्रेमानंद सूरे  की  कोठरी की ओर चल देती है । यह कैसा अदभुत प्रेम ! नहीं देखा कि उजाला हो आया, दीये की रोशनी से ज्यादा उजला उजाला । गाँव के लोगों ने कहा , यह तो प्रताप की दुल्हन है, बिचारी अपने आदमी की बाट हेर रही है , बिछोह में तन-मन की खबर भूल गई है। इतना भी होश नहीं रहा कि दिन उग आया है। नाइन की बहू फूँक मारकर दिवला बुझा देती है । रज्जो उस छोटे बच्चे की भाँति नाइन बहू की अंगुली थामे लौट आती है जिसे यह नहीं पता कि अंगुली थामने वाला उसे कहाँ ले  जा रहा है ? रज्जो की सास कहती है-
"मोरी पुतरिया कितै भरमी हो ? पिरताप की बाट देख-देखकर तुम्हारी आँखे पथरा गई !" (पृ.सं.-91)
"रज्जो उस बुझे हुए दीए की तरह खुद भी नीचे बैठ गयी मानो प्रकाश विहीन दीये की सारी अगन रज्जो ने सोख ली , जलन कलेजे में उमड़ रही थी ।"(पृ.सं.-91) 
सास और रज्जो दोनों जोर-जोर से रो पड़ीं । शोकगीत ने आँगन को ढँक लिया । किसके वियोग में गीत बज रहा था ? प्रताप के या ईसुरी के ? दोनों जानती थीं, दोनों के दुःख का कारण दो पुरुष हैं ।

प्रताप का चचेरा भाई रामदास रज्जो का जीना दूभर कर देता है। तीन बेटियों का बाप रामदास कुल की मर्यादा बचाने तथा कुलदीपक पैदा करने के लिए एवं  प्रताप के हिस्से की जमीन हथियाने की चाह में रज्जो से शादी करना चाहता है। उसके अत्याचार से तंग आकर रज्जो घर छोड़ गंगिया बेड़िन के साथ भागकर देशपत के साथ जा मिलती है , जो देश की आजादी के लिए अपनी छोटी सी सेना के साथ अपने  प्राण तक न्यौछावर करने को तैयार है। यहीं रज्जो को खबर मिलती है कि प्रताप गोरे सिपाहियों से बगावत कर अपने देश के खातिर शहीद हो चुका है। रज्जो दो बूँद आँसू अपने वीर पति की याद में श्रद्धांजलि स्वरूप अर्पण करती है। शरीर का साथ वर्षों से नहीं रहा वहीं मन इस कदर बँधा था । तभी तो कहती है -
 "गंगिया जिज्जी,प्रेम के लिए देह ज़रूरी  नहीं है पर देह के लिए प्रेम ज़रूरी है । उनके तन की खाक मिल जाती, हम देह में लगा के साँची जोगिन हो जाते ।"(पृ.सं.-278)

देशपत की फौज में जासूसी का काम करने वाली रज्जो पर कुंझलशाह की बुरी नजर पड़ती है । देशपत की फौज का बाँका सिपाही राजकुमार आदित्य रज्जो को कुंझलशाह के कहर से मुक्ति दिलाता है। रज्जो आदित्य से घुड़सवारी तथा तलवारबाजी सीखती है।

1857 में अंग्रेजों ने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र को मान्यता देने से इंकार करते हुए रानी के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूँक दिया । रानी को बचाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेती हुई रज्जो रानी का बाना धारण करती है और  अंग्रेजों के साथ लड़ाई करते हुए रानी से पहले शहीद हो जाती है ।


इधर अपने प्रायश्चित के ताप में तप रहे ईसुरी को आबादी बेगम के द्वारा वीरांगना रज्जो के शहीद होने की खबर मिलती है । अपने जीवन की आखिरी जंग लड़ रहे ईसुरी आँखें मूँदे आखिरी निरगुण फाग गाते हुए सदा के लिए खामोश हो जाते हैं ।
 "कलिकाल के वसंत में न गोमुख से धाराएँ फूटी न तरुणियों ने रंगोलियाँ सजाईं, न दीये का उजियारा , न ही उल्लास की टोकरी भरता अबीर गुलाल ईसुरी ने अखंड संन्यास  की ओर कदम रख दिया ।"(पृ.सं.-340)
 ऋतु ने अपने शोध का ऎसा अंत कब चाहा था ! आंकाक्षा थी कि ईसुरी और रजऊ का मिलन होता ,वे अपनी चाहत को आकार देते हुए जीवन यात्रा तय करते और फागों का संसार सजाते । मगर चाहने से क्या होता है जानने की पीड़ा और दूर होते जाने की दर्दनाक मुक्ति तन और मन मिलने पर भी भावनाओं का ऎसा बँटवारा!  ऋतु और माधव दोनों के रास्ते अलग-अलग । ऋतु को माधव का संबंध विच्छेद पत्र मिलता है -
"ऋतु मुझे गलत नहीं समझना । साहित्य से आदमी की आजीविका नहीं चलती । भूख आदमी को कहाँ से गुजार देती है, यह मैंने गोधरा और अहमदाबाद के दंगों के दौरान देखा है। ऋतु मुझे क्षमा करना रिसर्च रास नहीं आई । अभावों भरी जिंदगी तो बस तरस कर मर जाने वाली हालत है, संतोष कर लेना भी गतिशीलता की मृत्यु है और इस बात से तुम ना नहीं कर सकतीं, जानेवाला टूटा हुआ होता है, उसके तन मन में टूटन के सिवा कुछ नहीं होता। तुम्हें टूटकर चाहने के सिवा मेरे पास कुछ भी नहीं है ।"(पृ.सं.-306-307)

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या ईसुरी रजऊ को अहिरिया कहकर राधा के विराट व्यक्तित्व से जोड़ना चाहते थे? या राधा जैसी मान्यता दिलवाकर कुछ छूटों का हीला बना रहे थे, जो साधारण औरत को नहीं मिलती है। नहीं तो रजऊ को मीरा से क्यों नहीं जोड़ा गया ? ईसुरी कृष्ण भगवान नहीं थे जो विष को अमृत में बदल देते। वे हाड़ माँस की पुतली अपनी रजऊ से  पूजा नहीं, प्रीति की चाहना करते थे । भगवान की तरह दूरी बनाकर जिंदा नहीं  रहना चाहते थे।

मैत्रेयी पुष्पा ने वर्तमान और अतीत में एक साथ गति करने वाली इस सर्पिल कथा के माध्यम से कल और आज के समाज में स्त्री जीवन की त्रासदी को आमने-सामने रखने में बखूबी  सफलता पाई है। रजऊ की संघर्ष गाथा तब और अधिक प्रबल हो उठती है जब वह 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से  सक्रिय रुप से जुड़ती है। ईसुरी का प्रेम जहाँ उसे कभी राधा बनाता है और कभी मीरा | वहीं वह प्रताप की मृत्यु पर जोगन की तरह विलाप करती है और अंततः देश के लिए एक साधारण सैनिक बनकर शहीद होते हुए लोकनायिका बन जाती है । ईसुरी पर शोध कर रही ऋतु एंव उसके प्रेमी माधव के बहाने मैत्रेयी पुष्पा ने शिक्षा और शोध तंत्र में व्याप्त जड़ता पर भी  प्रहार किया है। ऋतु और माधव के जरिए लेखिका ने एक बार फिर रजऊ और ईसुरी की प्रेमकथा को जीवंत  किया है। 
"वहीं  ’प्रेम’और ’अर्थ’ में एक विकल्प के चुनाव पर माधव अर्थ के पक्ष में हथियार डाल देता है।" (प्रो.ऋषभदेव शर्मा , स्वतंत्रवार्ता, 06 फरवरी ,2007)
और रजऊ की भाँति ऋतु भी अकेली रह जाती है। इस प्रकार मैत्रेयी पुष्पा रजऊ से लेकर ऋतु तक अपने सभी स्त्री पात्रों को संपूर्ण मानवी का व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। ’कही ईसुरी फाग’ की जो बात सबसे ज्यादा आकर्षित करती है वह यह है कि  रजऊ और ऋतु दोनों ही अबला नहीं हैं, वे भावनात्मक स्तर पर क्रमशः परिपक्वता प्राप्त करती हैं और उनके निकट प्रेम का अर्थ  पुरुष पर निर्भरता नहीं है।