कविता (poem) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता (poem) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 11 सितंबर 2013

बेटी के नाम माँ की पहली चिट्ठी



पुराने कागजो में मिली आज -------------
----------बरसों पहले मुझे ससुराल में 
लिखी माँ की पहली चिट्ठी ------------
---------कितनी नसीहतें है इसमें 
कुछ प्यार भरी धमकी भी ------------
------------ठीक से रहना ससुराल है तेरा 
जोर से मत हंसना -धम धम कर के भाग दौड़ न करना 
पता नहीं तुझे कब अक्ल आएगी समझती ही नहीं 
हे भगवान ये पगली गुड़िया भी छुपा कर ले गई अपनी 
अच्छा सुन! उसे निकाल कर खेलना मत 
वरना सब तेरे बाबुजी और माँ को कहेंगे --------
कुछ तौर-तरीका ही नहीं सिखाया इसकी माँ ने ------
कोई शिकायत न आये वहाँ से समझी ?
रोज सुबह उठ कर बड़ों के पैर जरुर छूना 
भूलना मत सबके पैर छूना समझ रही है न ?
तुझे समझया था -- मुझे याद आया माँ ने 
विदाई के समय फुसफुसाकर कान में कहा था कुछ 
फिर मुझे हंसी आ गई ---- सब याद करके 
जब मैने तुनक कर कहा था क्या इस लड़के का भी 
न नहीं बिलकुल नहीं छूना मुझे! नहीं करुँगी जाओ 
माँ का चेहरा पीला पड़ गया, न जाने क्या करेगी ये लड़की
कोई अक्ल नहीं, सहूर भी नहीं इसे मना किया था
मत करो इसकी शादी अभी से -----
हाथ में कांपती हुई माँ की चिट्ठी का 
ये पीला जर्जर कागज़ ऎसा प्रतीत हो रहा है
मानो मेरी बीमार माँ का कमजोर चेहरा हो 
जो आज भी पीला पड़ जाता है मेरी चिंता में 
चिट्ठी के पीले पड़े कागज़ में दो बूंद आंसूओं के निशान हैं 
उन्हें छुआ वो अभी भी नम है ----- 
बस दो बूंद ढलक गई मेरी आँखों से --
बुदबुदा उठी ओंठो में इक हूक सी उठी कलेज़े में 
माँ इस बार जल्दी आउंगी मैं -तुम्हारी गोद में सर रख कर 
रोना है मुझे -- ढेर सारी बातें करनी है 
और वह गुड़िया उसकी सिलाई उघर गई है 
फिर भी सहेज़ रखा है तुमने बनाई थी न 
इस बार आउंगी उसे फिर से सी देना 
तुम सी दोगी न माँ --मै फिर से जी लुंगी 
अपना अधूरा छूटा बचपन ----- !!
--------------------- DIPTI

शनिवार, 7 सितंबर 2013

पिता की पगड़ी

पिता की पगड़ी / कपड़े की नहीं होती है
बेटी के देह की बनी होती है। 
जहाँ जहाँ बेटी जाती है 
पिता की पगड़ी साथ जाती है। 
पगड़ी का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध मात्र बेटी से है 
बेटे को उससे कोई सहानुभूति नहीं
 न ही अन्दर से
 और न बाहर से।।

बेटा चाहे कितना ही 
काला होकर आता है, 
पगड़ी की सफेदी 
बेदाग रहती है।
वह तो बेटी है कि तिनका हिला नहीं
पगड़ी पहले मैली हो जाती है।।

इसलिए तो हर बाप अपनी बेटी से कहता है 
बेटी पगड़ी की लाज रखना,
भाई से होड़ मत करना
वह तो वंश बेल है। 
अमर बेल की तरह 
उसी से घर की शोभा है।।

बेटियां बेजुबान रहें 
इसी में वे चरित्रवान हैं। 
पगड़ी कभी नहीं फटती है 
बेटियां मिटती हैं।।

पगड़ी की सुरक्षा के लिए 
कम पड़ती हैं हजारों बेटियां। 
और यह अंतहीन सिलसिला......
चलता ही रहता है अनवरत। 
पिता सुख की नींद सोता है
बेटियाँ पगड़ी की लाज रखती हैं। 

फिर भी वे पराई कही जाती हैं
क्योंकि पहनते हैं बेटे पगड़ी का ताज,
रखती हैं बेटियाँ पगड़ी की लाज ॥





शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

घर-बाहर


औरतें
और अपने घरों सें;
निकल कर भी
करती हैं मेहनते ,
लड़ती हैं सुबह से शाम तक
या फिर कानाफूसी करती हैं बैठकर
चबूतरे पर शाम तक
मौसम के भीतर उठता है
वसंत ,
लेकिन घरों में कभी नहीं बदलता
मौसम ,
इनकी आँखों में ठहरते हैं ,
आंसू ज्यादा देर तक
और भींगता है आँचल का छोड़
ज्यादा देर तक
नहीं देख पाती ये मौसम कैसे बदलता है ,
केवल देख पाती हैं ये
बेटियों का बढ़ना
जंगल की घास की तरह ,
बरसात के बांस की तरह
बेटियां बढ़ रही हैं
बेटियां पढ़ रही हैं
औरतों की नजर मैं रहती हैं
पढ़ती हुई बेटियां
बढ़ती हुई बेटियां
बेटियां निकल रहीं हैं घरों से
उन्हें और बढ़ना है ,
क्योंकि घरों में तो मौसम
नहीं बदलता
सिर्फ बढ़ती है बेटियां
बेटियां जो बनती हैं -औरतें