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शुक्रवार, 1 मार्च 2019

अलविदा दादा नामवर





नहीं रहे हिन्दी आलोचना के ब्रांड एमबेसडर नामवर सिंह | नामवर सिंह सही मायने में नामवर थे,सूफी परम्परा में एक कहावत है -'अच्छे लोगों को मरना अवश्य है ,लेकिन मौत उनके नाम को नहीं मार सकती  | पहले कुंवर नारायण सिंह ,केदारनाथजी ,कृष्णा सोबती ,अर्चना वर्माजी और अब नामवरजी | हिन्दी साहित्य धीरे-धीरे अनाथ होता जा रहा है | मानो ऐसा लग रहा है कि लगातार हम अपने दिग्गजों को श्रद्धांजलि देने के लिए अभिशप्त होते जा रहे हैं |

नामवर सिंह हिन्दी आलोचना के देदीप्यमान नक्षत्र थे , लगातार सम्वादरत आलोचक जिन्होंने लिखने से ज्यादा बोलकर यश कमाया | वह वाचिक परम्परा के आचार्य थे | ये आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे | एकबार किसी ने द्विवेदीजी से पूछा कि आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि उन्होंने कहा 'नामवर' | सही मायने में आज हिन्दी साहित्य का तीसरा मजबूत स्तम्भ समाप्त हो गया, एक युग का अंत हो गया |

नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1926 को बनारस के पास जीयनपुरा गाँव में हुआ था | इन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम ए और पीएचडी की | आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी उनके शोध निदेशक थे | कुछ दिनों तक बनारस विश्वविद्यालय में इन्होंने अध्यापन का कार्य किया | ये वामपंथी विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित थे | उन्हीं दिनों बतौर वामपंथी उम्मीदवार चुनाव में इन्हें करारी शिकस्त मिला | बनारस विश्विद्यालय के आंतरिक राजनीति से छुब्द्ध होकर सागर विश्वविद्यालय चले गये | बाद में ये दिल्ली जेएनयु में हिन्दी विभाग के संस्थापक विभागाध्यक्ष बने और वहीं से सेवानिवृत हुए | जेएनयु ने इन्हें प्रोफेसर इमेरिटस का दर्जा दिया था |

तकरीबन तीसियों से अधिक पुस्तक लिखकर इन्होने हिन्दी आलोचना साहित्य को समृद्ध किया|

किसी ने इनसे पूछा द्विवेदीजी से मूल शिक्षा क्या ग्रहण किया आपने ? इनका जबाव कुछ ऐसा था-

"चढिये  हाथी ज्ञान को सहज दुलीचा डाल |"

नामवरजी की दृष्टी में प्रेम की परिभाषा -" प्रेम पुमर्थों महान "

प्रिय पुस्तक -'रामचरितमानस"

प्रिय भोजन -'सत्तू'

प्रिय आलोचक -'विजय नारायणदेव शाही '

प्रिय कवि- 'रघुवीर सहाय' 
   
प्रिय कहानीकार- 'निर्मलवर्मा'

प्रिय उपन्यासकार -'फणीश्वरनाथ रेनू '

प्रिय निबंधकार -'हरिशंकर परसाई'

नामवर सिंह अकेले नहीं होते थे कलम उनका साथी  था लेकिन जब वे सही मायने में अकेले होते थे तो उनका मानना था -

"जब मैकदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की कैद मस्जिद हो मदरसा हो कोई खाना ख्वाह हो |"

नामवरजी पुनर्जन्म में  विश्वास नहीं करते थे | प्रो. गोपेश्वर सिंह ने उनसे पूछा ऐसा कौन सा काम जिसे ना करने का अफसोस हो  नामवर सिंह ने कहा -

"हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे निकले दम "

 जब इनसे पूछा गया बनारस से उखड़कर दिल्ली आ बसने पर आपने क्या खोया क्या पाया ?
इन्होनें कहा -"आपा खोया सरोपा पाया "

इनकी स्वयं रचित प्रिय पुस्तक थी "दूसरी परम्परा की खोज "

92 साल की आयु में इन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया ,26 जुलाई को वे 93 साल के हो जाते थे | नामवरजी ने अच्छा जीवन जिया और बड़ा जीवन जिया |
नामवरजी के यार दोस्त रकीब उन्हें अपने तरीके से श्रद्धांजली दे रहे हैं | वटवृक्ष , छतनार, शिखर पुरूष, प्रथम पुरूष ,श्लाका पुरूष शीर्ष आलोचक इत्यादि | सही मायने में हिन्दी साहित्य और आलोचना की दूसरी परम्परा के ध्वजधारक का अंत हो गया |


अर्पणा दीप्ति 

बुधवार, 23 जनवरी 2019

इन दो नैनन को मत खइयो,जिनमे पिया मिलन की आस



बाबा फरीद की ये पंक्तियाँ बचपन से सुनती आई लेकिन इनका अर्थ तब समझ में नहीं आता था | कागा यानी कि कौआ का प्रजाति कोई उससे क्यों कहता है कि “कागा सब तन खइयो,मेरा चुन-चुन खइयो मांस |/इन दो नैनन को मत खइयो,मोहे पिया मिलन की आस ||”


  लेकिन जैसे-जैसे जिन्दगी आगे बढ़ती गई और रंग दीखती गई इन पंक्तियों का अर्थ मैंने अपने स्तर पर समझने की कोशिश की | मुझे लगता है कि “कागा” यानि कि दुनिया के वे तमाम रिश्ते जो स्वार्थ और जरूरत पर टिके हैं ; जो हमेशा आप से कुछ न कुछ लेने की बात जोहते हैं-कभी भाई-बहन माँ-पिता बनकर तो कभी पति-पत्नी दोस्त या सन्तान बनकर आपको ठगते हैं | उनके मुखौटों के पीछे एक कागा ही होता है;-जो अपनी नुकीली चोंच से हमारे वजूद को, हमारे अस्तित्व को, हमारे व्यक्तित्व को हमारे स्व को निज को खाता रहता है | 

         
     हम लाख छुड़ाना चाहें खुद को वो हमें नहीं छोड़ता;-हमारे देह को हमारे तन को खाता रहता है चुन-चुनकर मांस का भक्षण करता रहता है | वो कई बार अलग-अलग रूपों में हम से जुड़ता है और धीरे-धीरे हमे समाप्त करता है |

    ये तो हुआ कागा और हम कौन है ? सिर्फ देह ? सिर्फ भोगने की वस्तु ? किसी की जरूरतों के लिए हाजिर समान की डिमांड ड्राफ्ट ?क्या है हम और पिया कौन है ? जिससे मिलने की चाह में हम ज़िंदा हैं ? कागा द्वारा सम्पूर्ण रूप से तन को खा लिए जाने का भी हमें गम नहीं ! उससे आग्रह किया जा रहा है कि “दो नैनन मत खइयो मोहे पिया मिलन की आस|” कौन है ये पिया ? यकीनन वो परमात्मा ही होगा जिसकी तलाश में ये दो नैना टकटकी लगाए है कि अब बस बहुत हुआ आ जाओ और साँसों की बंधन से देह को मुक्त करो |


  ये कागा उस विरहिणी का मालिक भी है जिसने उसे बंदिनी बनाकर रखा है और जो अपनी प्रियतम की आस में आँखों को बचाए रखने की विनती करती है | जब तक प्रियतम नहीं मिलते उसके प्राण नहीं जाएंगे | कितना दर्द है इन पंक्तियों में | देखा जाए तो इन पंक्तियों में गहरे  अर्थ भी है |मानो विरहणी कह रही हो कागा तू जी भरकर इस भौतिक देह का भोग कर ले मगर दो नैना छोड़ देना क्योंकि इसमें पिया मिलन की आस है और कागा अपना काम बखूबी करता है | अपनी जरूरत अपने अवसर और अपने सुख के लिए मांस का भक्षण किए जाता है | उसे विरहिणी के आँखों से क्या लेना-देना क्या सरोकार ? वो देह का सौदागर है हमेशा उसने अपना लाभ देखा है | किसी के आँखों में बहते दर्द नहीं देखे न ही पीर पराई देखी | इसलिए विरहणी कह उठती होगी कि –“कागा सब..........मोहे पिया मिलन की आस |
अर्पणा दीप्ति  





सोमवार, 21 जनवरी 2019

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है ?????





तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है ....../मेरा मरना, मेरा जीना इन्हीं पलकों के तले ......||
फैज अहमद साहब की पहली किताब “नक्शे फरियादी” में एक नज्म है-
“मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग !!” इसी नज्म में एक पंक्ति है –“तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है ?”
फैज साहब पंजाबी थे जिन आँखों के हुस्न से उन्होंने अपनी नज्म को सजाया था वे आँखें लन्दन की थी | उस खुबसूरत आँखों वाली का नाम था ‘एलिस कैथरीन जार्ज’ जो बाद में बेगम फैज बनकर एलिस फैज हो गई | इन आँखों को फैज अहमद साहब ने और अच्छी नज्म का विषय बनाया-

यह धुप किनारा शाम ढले,
मिलते हैं दोनों वक्त जहाँ |
जब तेरी समन्दर आँखों में ,
इस शाम का सूरज डूबेगा ....
और राही अपना राह लेगा |

आँखे हमेशा हर युग में शायरों और कवियों का प्रिय विषय रही है | लिखने वालों ने अपने नए-नए अंदाज में इन्हें अपने शब्दों से सजाया है | मशहुर गजल गायक जगजीत सिंह ने ‘इन साइट’ नाम से एक अल्बम बनाया इसमें एक गीत है –

जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है |
जो जी चाहे, वह हो जाए, कब ऐसा होता है ?
अब तक जो होता आया है वही होना है |


भारत से कई समन्दर दूर इटली के शहर पालेरमू के म्यूजियम में दो आँखें ऐसी है जिसे कोई एकबार देख ले जीवन में कभी भूल नहीं पाए | ये आँखें शायरों कवियों की आँखों की तरह किसी स्त्री के चेहरे की नहीं अपितु प्राचीन ग्रीक देवता “जेनस” की मूर्ति की है | इस मूर्ति की दोनों आँखों में से एक आँख मुस्कराती नजर आती है ; दूसरी बिना आंसू के रोते दिखाई देती है | एक ही चेहरे में एक साथ रोती और मुस्कराती आँखें ! ये आँखें जीवन का सत्य बयान करती हैं | यह भी तो सत्य है कि जीवन का सत्य जानने के लिए हर कोई राजगद्दी त्याग कर गौतम बुद्ध तो नहीं बन सकता |      
क्रमशः 

अर्पणा दीप्ति 

गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

प्यार अगर इंसान की शक्ल लेता तो उसका चेहरा अमृता प्रीतम जैसा होता



अमृता प्रीतम पर कुछ लिखना जैसे आग को शब्द देना, हवा को छुकर आना चांदनी को अपनी हथेलियों के बीच बांध लेना | प्रेम में डूबी यह स्त्री आजाद थी और खुद्दार भी उतनी ही | हालांकि प्रेम और आजादी दो विरोधाभासी शब्द हैं |प्यार जहाँ किसी को सिरे से बांधता है तो  वहीं आजादी हर बंधन को तोड़कर खुली हवा में  जीने और सांस लेने का नाम है | लेकिन अमृता ने प्यार के साथ आजादी को जोड़कर प्यार के रंग को थोड़ा और चटख और व्यापक बना दिया | यह खुद को आजाद करना ही था की सिर से पाँव तक साहिर के प्रेम में डूबे होने, तथा इस प्रेम के कारण अपनी बंधी-बंधाई गृहस्थी छोड़ने के बावजूद जब अख़बार में उन्हें यह खबर पढ़ने को मिलती है कि साहिर को उनकी नई मुहब्बत मिल गई , फोन की तरफ बढ़े उनके हाथ पीछे खिंच जाते हैं | अमृता न रोती है न आम स्त्री की तरह शिकवे-शिकायत करती है | यहाँ प्रेम के साथ खुद्दारी की बात जो ठहरी | अपनी जिन्दगी के सुनसान और उदास दिनों के अकेलेपन से चुपचाप गुजर जाती हैं| अमृता को तब नर्वस ब्रेकडाउन भी हुआ , जिससे वे बमुश्किल उबरी थीं| उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में लिखती हैं जिन्दगी की सबसे उदास प्रेम कविता उन्होंने इसी दौर में लिखीं |

“रसीदी टिकट” की भूमिका में अमृता लिखती हैं –‘मेरी सारी रचनाएँ,क्या कविता क्या कहानी क्या उपन्यास सब एक नाजायज बच्चे की तरह हैं | मेरी दुनियां के हकीकत ने मेरे मन के सपने से इश्क किया और उसके वर्जित मेल से ये रचनाएँ पैदा हुई | एक नाजायज बच्चे की किस्मत इनकी किस्मत है और उन्होंने सारी उम्र साहित्यक समाज के माथे के बल भुगते हैं|’

अपनी रचनाओं का यह परिचय न सिर्फ अमृता के विद्रोही तेवर को बताता है, बल्कि साहित्यक समाज के लिए उनके विक्षोभ और दुःख को भी दर्शाता है| हालांकि यह सच अमृता के हिस्से का सच होते हुए भी कुछ मायने में अंशत: सच है |यह सच है कि अपनी बगावती तेवर ने उनके हिस्से में हमेशा मुश्किलों को डाला |

यूँ ही नहीं एक दौर के पढी-लिखी लडकियों के सिरहाने अमृता की “रसीदी टिकट” हुआ करती थी | बल्कि उनके जीने-रहने के तौर तरीके भी कापी किए जाने लगे | अमृता आजाद ख्याल इन लड़कियों की रोल माडल रहीं | सबसे ख़ास बात यह कि इनमे से ज्यादातर लड़कियों के लिए उनके क्षेत्र और भाषा की लेखिका नहीं थीं | भाषा की दीवार से परे अपने शब्दों के पंख को उन्होंने खुला आकाश दे दिया था | अमृता का यही आकर्षण उन्हें ख़ास बनाता है | प्रेम और आजादी का चटख रंग उन्हें इमरोज में मिला | इस बात का प्रमाण अमृता के एक पत्र में मिलता है जो उन्होंने भारत के  स्वतंत्रता दिवस के दिन किसी अन्य देश में लिखा था | वे लिखती हैं –“इमुवा,अगर कोई इंसान किसी की स्वतंत्रता दिवस हो सकता है तो मेरे स्वतंत्रता दिवस तुम हो......”| यह प्यार के सदियों से चले आ रहे बंधे-बंधाए दायरे को विस्तृत करना था | इसमें अमृता से रत्ती भर भी कम हाथ इमरोज का न था |

प्रेम में डूबी हर स्त्री अमृता होती है या फिर होना चाहती है | पर सबके हिस्से कोई इमरोज नहीं होता,शायद इसलिए भी कि इमरोज होना आसान नहीं| खासकर हमारी सामाजिक संरचना में एक पुरुष के लिए यह खासा मुश्किल काम है | किसी ऐसी स्त्री से प्रेम करना और उस प्रेम में बंधकर जिन्दगी गुजार देना जो आपकी नहीं है | इमरोज यह जानते थे और खूब जानते थे | उस आधे-अधूरे को ही दिल से कबूलना और पूरा मान लेना ठीक वैसे ही जिसे दुनियादारी की भाषा में प्रेम अँधा होना कहा जाता है |

अमृता अपने और इमरोज के बीच के उम्र के सात वर्ष के अंतराल को समझती थीं | अपनी एक कविता में वे कहती हैं- “अजनबी तुम मुझे जिन्दगी की शाम में क्यों मिले ?/ मिलना था तो दोपहर में मिलते |” जब इमरोज ने अमृता के साथ रहने का निर्णय लिया अमृता ने  इमरोज से कहा- ‘एक बार तुम पुरी दुनिया घूम आओ, फिर भी अगर तुम मुझे चुनोगे तो मुझे कोई उज्र नहीं .....मैं तुम्हें यहीं इन्तजार करती मिलूंगी|’ इसके जबाव में इमरोज ने उस कमरे के सात चक्कर लगाए और कहा, ‘हो गया अब तो .....’ इमरोज के लिए अमृता के आसपास ही पूरी दुनिया थी | अमृता बचपन से बेचेहरा देखे जाने वाले जिस पुरुष की खोज में पुरी उम्र भटकती रही, वह शक्ल इमरोज के सिवा किसी और का हो ही नहीं सकता था | इस दुनिया से जाते-जाते अमृता इस सच को समझ चुकी थी, इसलिए उनका अंतिम नज्म “मैं तुम्हें फिर मिलूंगी” इमरोज के नाम थी केवल इमरोज के लिए |

साहिर वह शख्श नहीं थे | उतनी हिम्मत नहीं थी उनके दिल में या फिर दुसरे शब्दों में कहें तो प्यार | प्यार हमें हमेशा हमें हिम्मत की उँगलियाँ पकड़कर चलना सिखाता है | अगर लोग यह कहते हैं कि अमृता का प्यार एक तरफा था तो यह गफलत वाली बात भी नहीं | साहिर के लिए यह प्यार एक मुकाम जैसा था, तो अमृताके लिए उनकी पूरी जिन्दगी की रसद और उसकी मंजिल के जैसा | यह प्यार-प्यार के बीच का फर्क था | दो दृष्टियों और जीवनशैलियों या फिर कह लें तो दो व्यक्तित्व के बीच का फर्क भी | कुछ लोग इस प्रेम कहानी का खलनायक साहिर की माँ को मानते हैं, कुछ लोग अमृता के पिता और पति को | कुछ लोगों के लिए यह दीवार मजहब की थी | अमृता की माने तो खलनायक का वह काम उन दोनों की चुप्पी और उनके लिखने के भाषाओं के बीच उस अंतर ने किया | हालांकि यह तर्क सम्मत नहीं जान पड़ता | यह सब जानते हैं कि अमृता पंजाबी में लिखा करती थीं और साहिर उर्दू में हालांकि साहिर की मातृभाषा पंजाबी थी |

कुछ भी कह लें लेकिन अमृता की आत्मकथा को पढ़ने से यह साफ पता चलता है कि कमजोर कड़ी वे नहीं थीं | अपनी जिन्दगी और अपने प्यार से जुड़े अनुभवों को गीतों में ढालने में माहिर साहिर ने तो बड़ी सादगी से यह लिख दिया कि-“भूख और प्यास से मारी हुई इस दुनिया में मैंने तुमसे नहीं सबसे ही मुहब्बत की है;-‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों |’ पर यह अजनबी बन जाना अमृता के लिए कभी आसान नहीं रहा |

साहिर के लिए प्रेम बहुत आगे चलकर सामाजिक इन्कलाब की राह बनता है;वहीं अमृता के लिए उनकी मोहब्बत ही उनका इन्कलाब रही | छोटी-सी उम्र में तय की गई मंगनी का ब्याह में बदलना | फिर दो बच्चे होने के बाद उस ब्याह से, उस अकहे प्रेम के लिए निकल पड़ना कोई आसान तो नहीं रहा होगा | पर कोई आसान राह अमृता ने चुनी ही नहीं | वह चाहे बसी-बसायी गृहस्थी से निकल आना हो, या फिर अपनी पूरी जिन्दगी ब्याह के बगैर इमरोज के साथ बिता देना |

लिव-इन की जिस परिपाटी को आज हम फलता-फूलता देख रहें हैं, अमृता ने उसकी नींव 1966 में ही रख दी थी; पर इससे उनके रिश्ते पर कभी न कोई फर्क आना था  न आया | और न ही उनकी जिन्दगी पर इसका कभी कोई असर रहा | साहिर और इमरोज से अपने रिश्ते का बयान करते हुए अमृता कहतीं हैं-“साहिर मेरी जिन्दगी के लिए आसमान हैं, और इमरोज मेरे घर की छत |” इमरोज से बेपनाह प्यार करने के बावजूद भी वे अगर साहिर से अपने प्यार को नहीं भूल सकीं तो बस इसलिए कि स्त्रियाँ अपने हिस्से के सुख-दुःख को कभी विदा नहीं करती | एक कारण यह भी हो सकता है कि अपने लाख बगाबती तेवर के बावजूद वे अपनी पहली शादी से मिले पति के नाम प्रीतम को जिन्दगी भर साथ लेकर चलती रहीं |

अगर प्यार कोई शब्द है तो अमृता ने उसे अपनी कलम की स्याही में बसा लिया था | अगर वह कोई स्वर है तो अमृता के जीवन का स्थायी सुर रहा | जिस तरह अमृता ने इमरोज के लिए यह कहा कि अगर स्वाधीनता दिवस किसी इंसान की शक्ल ले सकता है, तो वह तुम हो | ठीक उसी तहर प्रेम अगर किसी इंसान की शक्ल में आए तो उसकी शक्ल अमृता जैसी होगी |
जिन्दगी की कहानी बस इतनी सी है ......एक रसीदी टिकट
(Revenue stamp) के पीछे भी लिखो तो काफी है ......!  
    
                                                 अर्पणा दीप्ति 
              


शुक्रवार, 25 मई 2018

मैं क्यों लिखती हूँ ?-भाग 5




मैं साथ चलना चाहती थी !

उसे कविता पढने और सुनने का शौक है और उसकी आत्मा को संगीत का, कविता दोनों काम कर रही है | वाल्टेयर ने कहा है कि कविता आत्मा का संगीत है , तो यह भी सच है कि संगीत आत्मा का भोजन है | वो चाहती थी कि आत्मा को बेहतरीन भोजन मिले ; इसलिए तो वो बेहतरीन कविता लिखना चाहती थी | उसे कविता की खोज अनवरत रहती थी | कविता न तो रियाज से बनेगी और न पढ़ने से | रियाज से नृत्य में निखार आ सकता है; वाद्य यंत्र काबू में आ सकते हैं और अध्ययन से बौद्धिकता की सीमा बढाई जा सकती है ; लेकिन कविता या तो आएगी या नहीं आएगी | यदि आप चल सकते हैं तो नाच भी सकते हैं किन्तु कविता का सम्बन्ध आत्मा से है, यह ह्रदय का विषय है |
अर्पणा दीप्ति 


कविता की दुनिया बड़ी रहस्यमयी है ! कविता को चोरी किया जा सकता है , परन्तु लिखने की तकनीक को कैसे चोरी करोगे आप | एक कहानी मुझे याद आ रही है- “एकबार की बात है चिड़ियाँ और मधुमक्खी में दोस्ती हुई | चिड़ियाँ ने मधुमक्खी से कहा कि तुम इतना मेहनत करके शहद बनाती हो ; इंसान आता है तुम्हे खदेड़ कर भगा देता है और तुम्हारा शहद चुरा लेता है | मधुमक्खी ने मुस्कान बिखेरते हुए कहा-भले ही इंसान मेरा बनाया हुआ शहद चुरा लेता है ; परन्तु वो आज तक मेरी शहद बनाने की तकनीक को नही चुरा पाया !

वैश्वीकरण और बाजारवाद के इस दौर में मौलिकता का अधोपतन हुआ है | आज भी कुछेक अनछुए गाँव बचे हुए हैं, जहाँ मौलिकता को महसूस किया जा सकता है ; छुआ जा सकता है | गाँव की सबसे खुबसूरत बात यह है कि घर की दहलीज से ही खेतों की सीमा आरम्भ होती है | खेत की सीमारेखा तय करनेवाले मेड़ के पास कुछ हिस्से घास के लिए होते हैं | वसंत के मौसम में इन्ही स्थानों पर आकाशवर्णी तथा पीले फूल खिलते हैं ; रंग-बिरंगी तितलियाँ और भंवरे फूल दर फूल सैर करते हैं | क्या मजाल फूल या तितलियों की कोई पंखुरी टूट जाए ! चिडियों की अलग दुनिया तो झींगुर भरी दोपहरी में अपना तान छेड़े हुए | पहले चिड़िया, फूलो, तितलियों के लिए लिखा फिर दोस्तों के लिए | गाँव छुटा , तालाब बिछड़े, नदियाँ बिछड़ी, दोस्त बिछड़े | इसके किस्से भी डायरी के पन्ने में दर्ज हुए | फिर इधर से नजर उधर गई तो देखा जो लिखा वह तो व्यर्थ था ! कलम तो भूख, दुःख, अन्याय और भ्रष्ट व्यवस्था आदि पर लिखने के लिए बनी हुई है, असली मुद्दे तो ये हैं | उसने मन में एक सुंदर समाज की तस्वीर गढ़ ली ; अब बेचैनी और बढ़ने लगी | उसको हमेशा इस बात की पीड़ा रहती थी कि जो छवि उसके मन में इस समाज की है वो हकीकत क्यों नही बन पा रही है ? अब उसका क्रोध विद्रोह में बदलने लगा | समय बीतता गया- तस्वीर लगभग वैसी की वैसी रह गई | उसे डायरी के पन्नों पर अपनी बात लिखने से थोड़ी राहत मिलती ; तनाव कम होता | एक रात उसकी आँखों में सुनहरे सपने आए | उस रात उसने कुछ नहीं लिखा , बस जो लिखा था उसे नष्ट कर दिया | मन हल्का हुआ नींद गहरी आई |

समय पानी की तरह बहता गया | व्यवस्था में ज्यादा बदलाब नहीं हुआ ; बस चल रहा है जैसे-कैसे | रोटी की व्यवस्था में संघर्ष की दिशा मुड़ गई | बेचैनी बराबर बनी रही | मन उदास भी रहता संगीत सुनना छूटने लगा | सुन्दर चीजें भी आकर्षित करने में असमर्थ होने लगी | पढने-लिखने का अब उसका मन नहीं करता ; मन में युद्ध चलता रहता | विचारों को किससे साझा करे ? अपनी परेशानी में किसे शामिल करे ?

एक दिन चलते-चलते उसका हाथ एक दोस्त ने धीमे से मगर मजबूत पकड़ और अद्भुत गर्माहट के साथ पकड़ा और कहा मैं तुम्हारे साथ चलना चाहता हूँ | उसे लगा कि यह साथ कभी न छुटने वाला है | आँखों में तैरते सपने एक जैसे ही थे ! अचानक आसपास तितलियों का उड़ना और फूलों का खिलना इस बात की पुष्टि कर रहे थे कि कठिन समय आसान होने वाला है | उस रात उसने कविता लिखी सुबह संगीत सुना | दिन में सूरज की रोशनी में छिपे सात रंग देखे | तब से वह पुनः अपनी अनुभूतियों को लिख रही है | हवा के लिए लिख रही है, मिट्टी के लिए लिख रही है, एक दोस्त के लिए लिख रही है ........|
     वो इसलिए भी लिखती है की बहुत सारे अनुभूतियों को व्यक्त नहीं कर पाती थी , बहुत सारी बातों को संकोचवश कह नही पाती थी | छोटी-छोटी बातों की शिकायत तो करती थी , लेकिन अपनी सम्वेदनाओं को व्यक्त नहीं कर पाती थी | इसलिए लिखती थी लिखना उसके लिए संवाद जैसा था ! जाने अनजाने में कि गई गलतियों की माफी के लिए लिखती थी | जो कुछ गलत है उसके विरोध में लिखती थी ; सच्चाई के पक्ष में भी डटकर लिखती थी | वो इसलिए भी लिखती थी ताकि सच ज़िंदा रह सके | दरअसल वह जीना चाहती थी ; अपनी यादों को संजोए रखना चाहती थी कठिन समय में मनोबल ऊँचा बनाए रखना चाहती थी |
 
अंतिम बात यह कि फिर सभी कवि क्यों नही बन जाते ? इसका सीधा उत्तर है कि सभी प्रेम भी तो नहीं करते ! प्लेटो ने ठीक कहा है – “प्रेम के स्पर्श से सभी कवि बन जाते हैं |”  

    






रविवार, 20 मई 2018

मैं क्यों लिखती हूँ?-भाग 2



To write is thus to disclose the world and to offer it as a taste to the generosity of the reader-why write?
आलेख में ज्याँ पॉल सात्रं द्वारा लिखित ये पंक्तियाँ की इस प्रकार लिखना की दुनिया को उजागर किया जाए, तथा इसे पाठक की सदाशयता पर छोड़ा जाए की वह इस कार्य को अपने हाथ में लें |  सात्रं की ये पंक्तियाँ मुझे बहुत प्रिय है |

अर्पणा दीप्ति 

अक्सर मेरे मन में यह सवाल उठता है की मैं क्यों लिखती हूँ ? जब बिना लिखे हुए भी दुनिया में अधिकाँश लोग अपना जीवन बड़े आराम से जी रहें हैं, तब लिखने में मुझे अपना समय क्यों जाया करना चाहिए ? एक बिजनेसमैन सोचता है किस तरह कम समय ने अधिक से अधिक ग्राहकों के सम्पर्क में आकर वह अधिक मुनाफा कमा सके, एक डाक्टर सोचता है की कैसे कम समय में अधिक से अधिक मरीजों को निपटाकर अधिक पैसे इकट्ठे किये जा सकें | एक ट्यूटर सोचता है की कैसे समय का अधिकाधिक उपयोग कर विद्यार्थियों के अधिक से अधिक समूहों को पढ़ाने का प्रयोजन हो और अर्थोंमुख होने का कीर्तिमान बनाया जा सके | ऐसी सोच के आज के इस गतिमान प्रवाह में जहाँ अपने समय को अर्थ में बदलने की होड़ लगी हो तब एक लेखक के मन में यह विचार आना स्वाभाविक है कि मैं क्यों लिखती/लिखता हूँ ?

यह जानते हुए भी की लिखना अपने समय को अर्थ में बदल पाने की कला से कभी आबद्ध नहीं कर  सकता, उसके बावजूद भी अगर मैं लिखती हूँ तो इस लेखन का मेरे जीवन में गहरे निहितार्थ है | इस निहितार्थ में जीवन के उन सारे मूल्यों के नाभिनालबद्ध होने की गहरी आकांक्षा है जिसे मैं अपने जीवन के साथ-साथ दूसरों के जीवन के आस-पास देखना चाहती हूँ | लेखक-लेखिकाओं के ऊपर प्राय: यह आरोप लगाए जाते हैं कि वे यश की इच्छा के गम्भीर रोग से ग्रसित होते हैं और उनका लेखन इसी रोग का प्रतिफलन है | पर यह तथ्य सही प्रतीत नहीं होता, क्योकिं यश की दौड़ में आज का लेखक कहीं भी ठहरता हुआ नजर नही आता ! यह एक ऐसा दौर है जिसमे अमिताभ बच्चन, अनुष्का शर्मा, विराट कोहली सलमान खान, सोनम कपूर जैसे विचार शून्य सेलिब्रिटीज ने यश की लगभग समूची जगह को घेर सा लिया है | आज की यह दौर विचारशून्यता को पोषित करने का दौर है, जहाँ लेखक के लिए कोई जगह शेष नहीं है | इसके बावजूद मैं लिखती हूँ तो मेरा लिखना यशोगामी कैसे हो सकता है ? मेरे आस-पास क्या सब कुछ ठीक है ? जब देश-दुनिया की अधिकाँश आबादी ने अपने समूचे समय और जीवन को अर्थ उपार्जन और कामवासना की तृप्ति के लिए ही रख छोड़ा है ऐसे में भला सबकुछ कैसे ठीक हो सकता है ? मुझे यह भी मालूम है मेरे लिखने से सब कुछ ठीक नहीं हो सकता फिर भी मैं लिखती हूँ | इस लिखने में एक सूक्ष्म आकांक्षा है कि सबकुछ न सही, उसके रत्तीभर आकार का हिस्सा अगर ठीक हो सके तब मेरा लिखना सार्थक है | यह सोच मेरे दिमाग में आती-जाती है इसलिए भी मैं लिखती हूँ |

मेरा लिखना देश में किसानों की आत्महत्या को रोक नहीं सकता, मेरे लिखने से देश में हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध नहीं रुक जाएंगे !  मेरे लिखने से देश में पसरी अराजकता खत्म नहीं हो जाएगी ! इन सबके बावजूद अगर मैं लिखती हूँ तो यह चाहती हूँ कि मेरे भीतर पसरी हुई बैचेनी थोड़ी कम हो जाए | मैं इसलिए लिखती हूँ कि इन बुराइयों का विरोध कर सकूं | इन बुराइयों के विरोध में उपजा मेरा लेखन उन बीज की तरह है जिसमे किसी दिन पेड़ बनने की सम्भावना मुझे नजर आती है | इसलिए भी मैं लिखती हूँ |

मैं सिर्फ अपने लिए नहीं आपके लिए भी लिखती हूँ कि आप मेरे लिखे को कभी समय निकालकर पढ़ सकें और अपनी खोई हुई मनुष्यता की ओर लौटने की कोशिश कर सकें | अगर आपके लिए पढना संभव न भी हुआ तो मेरे लिखने से दुनिया को कोई नुकसान भी नहीं होनेवाला है | क्योंकि मैं कोई अपराधी तो हूँ नहीं और न लोगों के दिल दिमाग में डर पैदा करने वाली शख्स हूँ | मैं तो बस लिखनेवाली बस एक अदना सी कलमकार हूँ, आपके लिए जिसे लेखक मान लेने की मजबूरी भी नहीं है | किन्तु मेरे लिखे से फिर भी आप अराजक होने की छवि से डर जाते हैं, तो इसका अर्थ है की मनुष्यता के पक्ष में इस डर को बनाए रखने के लिए मेरा लिखना कितना महत्वपूर्ण है | अराजक लोगों के इस डर ने ही तो दुनिया भर में शब्द और विचारों की महत्ता को स्थापित किया है | इस स्थापना को मैं और प्रगाढ़ करना चाहती हूँ | मैं पूरी दुनिया में मनुष्यता को बचाए रखने की पक्षधर हूँ इसलिए भी मैं लिखती हूँ |

क्रमश:

     


  

बुधवार, 2 मई 2018

चिट्ठियां हो तो हर कोई बांचे आपकथा न बांचे कोई




      
     
 आज मन में एक अजीब सा द्वंद  चल रहा है | मन क्यों विचलित हो रहा है ? सब कुछ तो है, सब कुछ  ईश्वर की अनुकम्पा से जिन्दगी भी यथावत ठीक-ठाक चल रही है | फिर ये बेचैनी क्यों, ये उलझन क्यों ? कितना भी अपने आपको व्यस्त रखूं सुकून नहीं है ! न कक्षा में न छात्रों के साथ, न गृहकार्य में, और न ही अपना मन पसंद कार्य लेखन में ! ये क्या हो गया है मुझे ? बहुत जिम्मेदारियां हैं कंधों पर , थक चुकी हूँ इन जिम्मेदारियों का बोझ उठाकर | जी करता है हिमालय के कन्दराओं में जाकर कुछ दिन बैठूं, तपस्या करूं शांति की खोज करूँ उन बर्फीले हिमशैल मालाओं में शायद कहीं से मिल जाए !


 ये रक्त पाश ही तो हैं जो आप के अन्दर कितनी भी तिक्तता क्यों न हो किन्तु परिस्थितवश स्वत: ही आपको एक दूसरे की और खींच लेता हैं ! रक्तपाश मोहपाश ही तो है | मन चाहकर भी अलग-थलग नहीं हो पाता है परिस्थितियाँ आपको जोड़ देती है | किस नागपाश में जकड़ रही हूँ मैं ? कटुताओं का हालाहल पीकर नीलकंठ ही तो हो गई मैं !

    कुछ स्थितियां जीवन में ऐसी आती हैं जहाँ आप चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते हैं | आप बस तमाशबीन होते हैं रेत के मानिंद मुट्ठी से सब कुछ फिसल जाता है | मन चीत्कार करता है, परिस्थितयों की गुलाम, मर्यादा के जंजीरों में जकड़ी असहाय और विवश सिवाय आंसू बहाने, और भाग्य के भरोसे बैठने के सिवा और कुछ भी नहीं कर सकती | यह भी उतना ही कटु सत्य है कि मैं भाग्यवादी नहीं कर्मवादी हूँ मेरे जीवन का मूल मन्त्र कर्म है | आंसू और भाग्य को मैं कमजोरों की निशानी मानती हूँ | वैचारिकता क्या मात्र औपचारिकता है ? मन को संयत कर रही हूँ, समझा रही हूँ की धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय | लेकिन मन है की शांत होने का नाम नही ले रहा | बड़े-बुजूर्ग ठीक ही कहते  हैं “जब आप के हाथ में कुछ भी नहीं है तो सब कुछ शांत और निर्विकार भाव से ईश्वर के हवाले कर दीजिये | हौसले बुलंद रखिए ;शायद यही सम्बल बने !

क्रमश:
किन रिश्तों की बात की जाए सब अपने ही तो है स्वार्थ और वैचारिकता की चारदीवारी ने एक सीमारेखा का निर्धारण कर दिया है | क्या इनका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता ? अतिक्रमण करने पर शायद मैं निर्लज्ज ठहराई जाऊं | परिस्थितिवश विवश मन हाहाकार कर रहा है | किसको गलत कहूँ किसको सही फैसला नहीं कर पा रही हूँ | झूठ, फरेब, चाटुकारिता, हेराफेरी मुझे पसंद नहीं दूसरों से भी यही आस लगा बैठती हूँ हताश होती हूँ | यह दुनिया आभासी है, स्वार्थी है | अपने आपको छलते हैं कितना तकलीफ होता है ह्रदय कांच के मानिंद दरकता है फिर न जुटने के लिए | इस पीड़ा को वह क्या जाने जिनके पाँव कभी न फटे विंबाई |

समाज पुरुष प्रधान, परिवार पुरुष प्रधान तथा परिवार की महिलाओं में भी मर्दवादी मानसिकता ! ये मानसिकता हमेशा अन्याय ही तो कर बैठता है | अन्याय और दमन से ग्रसित एक और चेहरा | क्या लिखूं क्या छोडू ? रिश्तों का वटवृक्ष धराशाई होने के कगार पर ! भीष्मपितामह अपनी लक्ष्मणरेखा में | श्वेत वस्त्र को पाक-साफ करने में लगे | घड़ियाली आंसू के साथ पुन: पल्ला झाड़ वाली स्थिति !
मां कहती थी-“सच हारता नहीं झूठ के पाँव लम्बे नहीं होते “ लेकिन यहाँ पाँव की लम्बाई कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है |
क्रमशः      
     




शनिवार, 31 मार्च 2018

आधुनिकता के आईने में कहानी







श्री टी. वल्ली राधिका की कहानी संग्रह “पायोजी मैंने...” मूलतः तेलुगू कहानी  संग्रह है इसका हिन्दी अनुवाद आर.चन्द्रशेखर ने किया है | अनुदित हिन्दी संग्रह की भाषा बहुत ही सरल है | कपोल कल्पना से परे इसे दिन-प्रतिदिन की घटनाओं से लिया गया है | लेखिका स्वयं विज्ञान तथा टेक्नालजी की छात्रा तथा आईटी उद्यमी हैं | अत: इनकी कहानी के पात्र फैंटसी के ताम-झाम से पड़े बिना लाग-लपेट के निर्विकार दिखते हैं | संग्रह की कहानियों को पढने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि  ये हम सब की कहानी है | कहीं न कहीं हम भी इस कहानी के किरदार हैं | किसी कहानी का पात्र अमरुद का पेड़ है, तो किसी कहानी का पात्र दो दशक से काम करनेवाली घरेलू नौकरानी तो कहीं जीवन रूपी रथ को सहजता से खींचते हुए तथा सामंजस्य बिठाते हुए दम्पति है, तो कहीं मितव्यता का गुण सीखती ननद-भाभी | इस संग्रह में कुल मिलाकर बारह कहानी है | हर कहानी में स्त्री लैंस से भोगा तथा जीया गया समाज का वृहत्तर अंश है |
“सहधर्मचारिणी” गृहस्थ जीवन के ताने-बाने से बुनी हुई कहानी है तो “गुरुत्व” कहानी में यह दर्शाया गया है की किसी भी चीज पर विश्वास न करना, परिहास उड़ाना सामान्य सी बात है | किन्तु जब मनुष्य का सामना सच से होता है तो वह उस आलोक से आलोकित हो उठता है | यही इस कहानी की विशेषता है | चारदीवारी के पार खड़े अमरुद के पेड़ को कथा नायिका देखती है और नाराज होती हैं | एक दिन वह जब शाम को घर जल्दी लौटती हैं और सर उठाकर अमरूद के पेड़ को देखती हैं तो दंग रह जाती हैं-“किस तरह वह कई जीव-जन्तुओं को आशियाना दे रहा.......सुरक्षा प्रदान कर रहा है......”(पृ.10) यानी कि किसी भी वस्तु को मात्र उसकी सतह से परखना उसके तलछट का सत्य नहीं है | उस सत्य से तभी परिचित हुआ जा सकता है जब उसे निकट से देखा-परखा जाए | यह कहानी गहरे सन्दर्भों में पर्यावरण के महत्ता को दर्शाती है |
“पायोजी मैंने....” की नायिका नित्या श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ के मिथक को तोड़ते हुए उपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने की दरकार रखती है | नित्या आत्मविश्वासी, तेजस्वी, सुलझे हुए विचारोंवाली निर्भीक और बेबाक स्त्री है | जाहिर है वह मात्र स्त्री देह नहीं मस्तिष्क भी है | नित्या ने हंसते हुए कहा-“मैं होती तो लाखों नहीं करोड़ों रूपये दिए जाएँ उस तरह डांस करने के लिए तैयार नहीं होती |” (पृ.74)
“मुक्ति” कहानी की भूमि कॉर्पोरेट जगत से निर्मित है | कहानी के दो मुख्य पात्र प्रिया और विनीत एक कम्पनी में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं | यह कहानी यह दर्शाता है कि महत्वाकांक्षा के उड़ान को अतिस्वछंदता दे दी जाए तो उसका कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता | सम्पूर्ण कहानी का मूलमंत्र एक वाक्य है “चपलताओं और इच्छाओं का सांगत्य करने वाला मन.....इन्द्रियों का गुलाम बना मन.......क्रोध और लोभ का कारण बनता है |” (पृ.110)
अन्य कहानियाँ भी जैसे ‘सत्य के साथ’ ,’सीमाओं के बीच’ , ‘सत्य’ , ‘चयन’ , आदि अपनी सम्वेदनाओं के विस्तार और मूल्यों को अपनाने की ओर अग्रसर करती दिखाई देती हैं | कहानी के मुख्य छ: तत्व होते हैं-कथा-वस्तु, पात्र , चरित्र-चित्रण, भाषा-शैली, पूरक घटनाएँ, वार्ता और परिस्थितियां | इन छ: तत्त्वों का समावेश लेखिका ने अपनी कहानी में बखूबी किया है | इनकी हरेक कहानी एक संदेश लेकर खड़ी है जो आधुनिक परिवेश की विसंगतियों,विकृतियों विडम्बनओं एवं दरकते रिश्ते से जूझने के लिए जीवन का स्केच तैयार करती है | कहानी में कहीं भी भाषा का भदेशपना तथा किलिष्टता नहीं झलकता | जीवन में व्याप्त सहजता, मानवीय सम्वेदना, पारिवारिक सम्बन्धों की छावं, राग-द्वेष, खीझ-झुंझलाहट का का मनोवैज्ञानिक चित्रण इस कहानी संग्रह की विशेषता है | या यूँ कहिये मानवीय व्यवहार का मनोविज्ञान कहानी संग्रह में सर्वत्र विद्यमान है | भाषा की कड़ी भी जीवंतता तथा समग्रता से जुड़ी हुई है | श्रीवल्ली राधिका की कहानी भौतिक जगत से ली गई है | इनके स्त्रीपात्र कहीं भी स्त्रीपना से उठकर दैवी रूप धारण नहीं करती | आज के परिवेश में जब समाज दामिनी, गुड़िया,इमराना, भंवरीदेवी, निर्भया पर हुए अन्याय का बदल लेने के लिए सड़कों पर हैं वही श्रीवल्ली के स्त्रीपात्र बड़े ही साफगोई से अपने अस्तित्व को स्थापित करने में लगे हुए हैं | समग्र कहानी से जो निकलकर आया है वह यह कि समाज के साथ जो ‘स’ से जुड़ा हुआ है उसकी सकारात्मकता से हम क्यों अलग होते जा रहें हैं | हमारे पास अपार और अगाध है | कहानी संग्रह उम्दा तथा पठनीय है |   
   अर्पणा दीप्ति

शनिवार, 20 जनवरी 2018

शाश्वत प्रेम का आत्मसत्य “एक दीप सुगुणा के नाम”








मन के भावात्मक एवं रागात्मक अनुभूतियों की उपज कविता है | या यह  कहना उचित होगा की कविता ईश्वरीय प्रेरणा से प्रेरित संदेश है | इसलिए भावनाओं को आंदोलित करने की जो शक्ति कविता में है वह साहित्य के किसी अन्य विधा में नहीं है | लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कविता बौद्धिक हो गयी है फिर भी उसका सम्बन्ध मानव के रागात्मक वृत्तियों से है | कविता के चार तत्व माने गए हैं-भाव, कल्पना, बुद्धि और शैली | वहीं आचार्यों का मानना है कि ऐसा वाक्य जिसमे काव्य का गुण विद्यमान हो तथा इसका आधार कलात्मक कल्पना हो कविता कहलाती है |

   तेलुगु भाषी हिन्दी कवि डा. एम रंगय्याजी की रचना “एक दीप सुगुणा के नाम” में ये सभी गुण सहज रूप से विद्यमान है | कवि ने अपनी अनुभूतियों को जिस तरह से सार्वजनिक किया है, मानो यह अनुभूति उनकी अपनी नहीं उन सबकी है जिन्होंने इन परिस्थतियों को भोगा है | डा.रंगय्या ने अपनी इस कविता संग्रह के माध्यम से संयोग-वियोग का विस्तृत उल्लेख किया है | ऐसी परिस्थितियाँ तो हम सबके जीवन में आती हैं लेकिन कवि ह्रदय ही इसे शब्द का रूप दे सकता है |

     प्रस्तुत पुस्तक “एक दीप सुगुणा के नाम” कवि ने अपनी स्वर्गवासी पत्नी सुगुणा को समर्पित किया है | जब अपनी इन कविताओं को वह पुस्तक का रूप प्रदान कर रहे थे उस समय मैं पी.एच.डी. की शोध छात्रा थी | जीवन संगिनी प्राणघातक बीमारी की वजह से शनैः शनैः मृत्यु की ओर अग्रसर हो रही थी | बैचेनी मैं वह कभी-कभी हम लोगों के बीच आकर बैठ जाया करते थे | उनकी आँखों में हम  वह पीड़ा, दर्द, तड़प तथा जीवनसाथी का संग छुटने का भय स्पष्ट देखा करते थे | आखिरकार नियति के क्रूर चक्र के सामने किसी का बस नहीं चला सुगुणाजी कालकलवित हो गयी |
    संयोग-वियोग का ऐसा सहज-स्वाभाविक वर्णन पढ़कर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता संग्रह “जूही की कली” याद आती है | यहाँ यह कहना ठीक होगा की जूही की कली जहाँ एक अद्वितीय रचना है वहीं डा. रंगय्याजी की यह रचना दिन-प्रतिदिन की सामान्य गतिविधियों से प्रभावित है | बाल्यवस्था में मां का छाया सिर से उठ जाना तथा जीवन के उत्तरकाल में पत्नी वियोग की पीड़ा सचमुच असहनीय है | अगर जीवन जीना है तो पीड़ा को भुलना भी आवश्यक है कवि रंगय्या भी अपनी पीड़ा को काव्य के सार्थक पंक्तियों में अभिव्यक्त कर अपना जीवन जी रहें हैं | जीवन संगिनी की बातें ही पुरुष को सम्बलित करती हैं इन बातों से ही पुरुष जीवनरूपी संग्राम में सफल होता है  यथा-

“वे बातें हीं रही सदा जीवन का सम्बल |
उनसे ही पाया हर कठिनाई का हल ||”
पत्नी की याद में यदा-कदा अश्रु भी प्रवाह होने लगता है उन्हें –
कहाँ छिपा लूँ नीर नयन यह आ जाती है मुझको लाज |”
स्मृतियां तो अनंत होती हैं हम जीवन में जिसके साथ रहते हैं | समग्र जीवन में क्या-क्या घटित होता है यदि हम उनको एक एक करके सहेजना शुरू करें तो एक विशाल महाकाव्य बन जाएगा | डा. रंगय्या के साथ भी कुछ ऐसा ही है | पत्नी के साथ व्यतीत हर पल उनके मानस पटल पर छा जाता है |  स्मृतियों के अनंत पटल पर पत्नी से वियोग होने के उपरान्त भी वह संयोग की अवस्था में हीं जी रहें हैं –

“मगन उर कैसे करूँ मैं अर्चना
सुप्त मन कैसे संवारू कल्पना
दो हिचकियाँ स्वीकार कर लो
बस यही है मूक मेरी वन्दना |”

जानेवाला तो अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाता है केवल कल्पना ही शेष रह जाती है-

“कौन तुम्हारा दुःख-सुख का साथी होगा
किसके बल पर जीवनधारा पार करेंगे
मैंने इतना ही कहा तुम्हारी स्मृति से
सारे पतझड़ बन जायेंगे मधुमास |”

अपने अस्वस्थता के क्षणों में भी वह निरंतर पत्नी की परछाई को महसूस करते  हैं-

“बडबडाने लगता है बूढा आदमी
चुपके से आती है एक परछाई
पूरी देह चन्दन का लेप करती है
पर फिर भी कोई नहीं आता |”

पत्नी की राष्ट्रभाषा एवं मातृभाषा प्रेम को भी उन्होंने सहज दर्शाया है-

“कहा था तुमने हमसे जब
तेलुगू का हो हिन्दी अनुवाद,
चला उसी पथ पर मैं
मिला सुयश, कीर्ति-प्रसाद |

कवि अपनी स्मृतियों में इतना अधिक तल्लीन हैं की उनका पत्नी वियोग सुखद संयोग की कल्पनाओं में बीत जाता है परमधाम में पत्नी से जल्दी ही मिलने की कामना कर बैठते हैं –

अब तो तेरी याद लिए ,
जीता हूँ हर क्षण हर पल
..........................है
पूरा विश्वास मिलूँगा
बहुत जल्द आकर तुमसे
पता नहीं कब मिले निमत्रण
आने का उस दर से |”

इस कविता संग्रह को पढ़कर यह कहना सर्वथा उचित है की डा. रंगय्या  की पूरी कृति पत्नी के विभिन्न स्मृतियों का शब्द चित्र है | उठते बैठते, सोते जागते, चलते फिरते हर स्थिति में डा. रंगय्या पत्नी की स्मृति में खोये रहते हैं | उनके अपने विश्वास के अनुसार उनकी जीवन संगिनी सदा-सदा के लिए उनके संग है | जहाँ यह विश्वास हो वहां भला यह विरह वेदना कैसे प्रवेश कर सकती है | संयोग वियोग के हरपल को जीवंत बनानेवाली इस रचना के लिए कवि को अनेकानेक साधुवाद | प्रस्तुत रचना भाषा एवं भाव प्रधान है श्रेष्ठ है |  इसी विश्वास के साथ सुधी पाठक हर परिस्थितियों में इसे  पढ़कर अपने मन की बोझ को हल्का कर सकेंगें |   
      
                                          अर्पणा दीप्ति