मंगलवार, 19 जून 2018

गुमनाम लड़की के डायरी के कुछ और इन्द्रराज –भाग-4



हमारे समय में प्यार एक जादुई यथार्थवाद है |
कितनी रातों की हवाओं में उसके आंसुओं के नमी भरती रही| खिड़कियों से रिसकर बाहर आती उसकी सिसकियों ने कितने हरे पत्तों का ह्रदय विदीर्ण किए | तब कहीं जाकर वह एक बेरहम दुनियादार, गावदी कर्तव्यनिष्ठ स्त्री बन सकी |



एक स्वपनहीन समय में भी कुछ लोग स्वप्न देखते पाए गए | उन्हें दूर किसी दंडद्वीप पर निर्वासित कर दिया गया | वहां से रोज वे लोग अपने सपने को डोंगियों में रखकर अपने देश की दिशा में तैराते रहते | कुछ सपने रास्ते में तूफान के शिकार होते रहे | पर जो गन्तव्य तक पहुँचते रहे, वे खतरनाक ढंग से पूरे देश में फैलते रहे | जोखिम से बचने वाले लोगों ने सपने देखना तो दूर,उनके बारे में सोचना तक छोड़ दिया | वे तमाम सुख-संतोष-आनन्द देनेवाली चीजें, प्रतिष्ठा, ख्याति आदि के बीच जीते रहे | उनके पास खोने के लिए बहुत सारी चीजें थीं पर पाने को कुछ भी नहीं था क्योंकि वे अपने सपने काफी पहले खो चुके थे, और धीरे-धीरे मनुष्यता भी |
प्यार-
मैं सागर-तट पर लहरों के एकदम निकट, ताड़ वृक्ष के खोखल से एक डोंगी बनाती हूँ, उसके मुहं पर एक कड़ी ठोकती हूँ, उसमें रस्सी बांधती हूँ और फिर डोंगी को खींचकर लहरों से दूर ले जाती हूँ | डोंगी रेत पर गहरा निशान छोड़ जाती है | फिर मैं पूरनमासी तक इन्तजार करती हूँ | तब समुद्र चिंघाड़ता हुआ आता है | और रेत पर डोंगी के बनाए हुए रास्ते से  होकर उसके पास आ  जता है | फिर आश्चर्यजनक तरीके से अपने सीमान्तों को आगे बढ़ाकर वहीं रह जाता है | अगली अमावस पर फिर मैं डोंगी को रेत पर खींचकर पीछे ले जाती हूँ | फिर पूरनमासी की रात समुद्र डोंगी की बनाई राह से उसतक वापस आ पहुंचता है | इसतरह यह सिलसिला चलता रहता है | इस तरह समुद्र एक दिन पास के जंगल तक पहुँच जाएगा, पेड़ों और लताओं के जड़ तक | उस दिन मैं अपनी डोंगी लेकर समुद्र में निकल पडूँगी और अपनी मृत्यु की और बढती चली जाउंगी |



गुमनाम लड़की के डायरी में दर्ज कुछ और नोट्स और इम्प्रेसंश


-अल्बम जिन्दगी का सही पता नहीं बताते |
-डायरी इतिहास नहीं होती| उसमें सबकुछ वस्तुगत नहीं होता |
-जो सपने अपनी मौत मरते है, उनकी लाशें नहीं मिलती, अपनी मौत मरनेवाले परिंदों की तरह |
-खूबसुरती में यकीन करने के लिए चीजों को खुबसूरत बनाने का हुनर आना चाहिए |
-ताबूतसाज के दूकान में एक पर एक कई ताबूत रखे थे | वे किसी बहुमंजिली इमारत जैसे लग रहा थे  |
-रोमांसवाद था मार्क्सवाद का पूर्वज | एक बार मैं पूर्वजों को खोजने अतीत में चली गई | जहाँ सुंदर शिलालेखों वाले कब्रों से भरा एक कब्रिस्तान था | बड़ी मुश्किल से वहां से निकलकर वापस आना हुआ |
-मैं तुच्छता से भरी अंधेरी दुनिया से आई हूँ | इसलिय तुच्छता से सिर्फ नफरत ही नहीं करती, उसके बारे में सोचती भी हूँ |
-दूसरों के बनाए पुल से नदी पार करने के बजाए मैं आदिम औजारों से अपनी डोंगी खुद बनाने की कोशिश करती रही और तरह-तरह से लांछित और कलंकित होती रही ,धिक्कारी और फटकारी जाती रही, उपहास का पात्र बनती रही | पुरुषों ने शराफत की हिंसा का सहारा लिया| पराजित स्त्रियों ने भीषण इर्ष्या की |



-कई बुद्धिजीवी मिले , उन्होंने कई दार्शनिक बातें की, कविता के बारे में कई अच्छी बातें की और कई बार शालीन हंसी हंसे | उनकी हंसी कांच के गिलास में भरे पानी में पड़े नकली बत्तीसी जैसी थी | मेरा ख्याल है, ये बुद्धजीवी रात को अपने गुप्त अड्डे पर लौटते हैं और जीवितों का चोला उतारकर प्रेतलोक में चले जाते हैं |
-पुरुष जब पौरुष की श्रेष्ठता का प्रदर्शन करता है, वह स्त्री को बेवफाई के लिए उकसाता है |
-बुर्जुआ समाज में विशिष्ट व्यक्ति प्रतिशोधी, आत्मग्रस्त, और हुकुमती जहनियत के होते हैं | पराजय या पीछे छुटना उन्हें असहनीय होता है | शीर्ष तक पहुचने के लिए वे कुछ भी, कोई अमानवीय से अमानवीय कृत तक करने को तैयार रहते हैं |
-उस अनजान शहर में न जाने कितने वर्षों तक भटकती रही | जब वापस लौटने का घड़ी आया तो लाख खोजने पर भी वह अमानती समानघर नहीं मिला जहाँ अपनी सारी चीजें रखकर मैं उस शहर की सडकों पर निकल पड़ी थी | मैं उस शहर से वापस आ गई थी लेकिन मेरी भुत सारी चीजें वहीं छुट गई थी | चींजे शायद इन्तजार नहीं करती, लेकिन उनसे जुड़ी आपकी ढेरों यादें हो तो तो जिन्दगी भर उनकी यादें आती ही रहती हैं |
क्रमश:
        

शनिवार, 16 जून 2018

गुमनाम लड़की की डायरी में विश्व साहित्य से प्रेरित एक और इंदराज भाग-3



मेरे पास एक करामाती कोट है जिसे पहनकर मैं लोगों के नजर से ओझल हो जाती हूँ  और महान बनने का मुगालता पालनेवाले आत्माओं की तस्वीरें नागिन की तरह अपनी आँखों के कैमरे में कैद करती रहती हूँ | मेरे पास जादुई जूतियों की एक जोड़ी है जिसे पहनकर मैं मनहुस पाखंडियों और कूपमंडूकों के घेरे से पवन वेग से उड़कर भाग निकलती हूँ | मेरे पास सपनों और कविताओं की एक जादुई छाता है जो मुझे उदासी और एकाकीपन की ठंढी बारिश से बचाता है |
  मेरे पास अपने दुखों और हठों के कवच-कुंडल है जो मेरी आत्मा को क्षुद्रता भरे जीवन और कुरूप मृत्यु से बचाता है |
    मैं पंखोंवाले जिस गर्वीले घोड़े की सवारी करती हूँ वह मुझे विजय तक तो शायद न ले जाए, लेकिन वीरोचित पराजय तक शायद अवश्य ले जाएगा, या फिर हो सकता है की फिर उदात्त काव्यात्मक मृत्यु तक |
    “बूढ़े आदमी ने शिकायतना अंदाज में कहा हमारे जमाने में ..........|”
युवा आदमी ने मेज पर मुक्का ठोककर बूढ़े आदमी को अवहेलनापूर्ण निगाहों से देखते हुए आत्मविश्वास के साथ कहा- “हमारे जमाने में .......|”
बूढी स्त्री ने दोनों को उचटती निगाहों से देखा, फिर बेटी को शंकालू निगाहों से देखा और कुछ इर्ष्या और कुछ अफसोस और कुछ वर्जनाओं के स्वर में बोली “हमारे जमाने में ........|”
युवा स्त्री कुछ सोचती हुई कुछ ठिठकती हुई कुछ हिम्मत बांधती हुई जैसे कुछ पूछती हुई सी दूर क्षितिज की और देखती हुई बोली “हमारे जमाने में .........|”
क्रमश:

बुधवार, 13 जून 2018

गुमनाम लड़की की डायरी में एक रहस्य रोमांच भरी जादुई कहानी – भाग 2




अर्पणा दीप्ति 

(गुमनाम लड़की की डायरी जो मुझे आर.टी.सी बस में मिली थी उसमे सबसे लम्बा इंद्रजाल वाली यह कहानी है | कहानी क्या है ? कहानीनुमा कुछ है ! पर जो भी है बहुत ही दिलचस्प है | डायरी पढने से यह पता चलता है कि डायरी लिखने वाली सिद्धहस्त लेखिका तो नहीं है लेकिन उसने विश्व साहित्य के लेखकों गोगोल से लेकर मार्खेज और लारा इस्कीवेल आदि की लैटिन अमेरिकी जादुई यथार्थवादी कहानियां पढ़ती रही है और मुक्तिबोध को भी उसने पढ़ा है | यह उसकी डायरी से पता चल जाता है भाषा में कच्चापन है इसके बावजूद यह कहानीनुमा चीज काफी दिलचस्प है | भाषा में कुछ सुधार कर मैं इसलिए इसे यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ |)

एक भूतबंगले में कैद मैंने उम्र का एक बड़ा हिस्सा गुजार दिया | फिर जब तमाम सुरंगों से गुजरकर, खिड़कियों से कूदकर, चारदीवारियों में सेंध लगाकर मैं बाहर आयी तो बरसों बाद पाया कि वह एक बड़ा भूत बंगला था, जिसमे तमाम सुरंगे, खुली खिड़कियाँ और चारदीवारी के कमजोर हिस्से मेरे लिए ही छोड़ दिए गये थे | फिर उसी तरह के जतन  करके हिकमत लगाकर मैं जब उस भूत बंगले से बाहर आई तो फिर पता चला कि वह एक और बड़े भूत बंगले के बीच का खुला आँगन था जिसमें वह भूत बंगला था जिसके भीतर सबसे छोटा वाला भूत बंगला था |

    इस तरह सात बार हुआ | हर बार एक छोटे भूत बंगले से बाहर निकलकर खुद को मैं एक बड़े भूत बंगले में पाती रही | फिर मुझे एक आदमी मिला जो भेष बदलकर बंगले की पहरेदारी में शामिल था | वह कुछ अलग था | उसकी आँखों में सहानुभूति और सरोकार के रंग थे | उसने मुझे भूत बंगले की जादू से मुक्त होने की तरकीब बताई और एक दिन मैं उसी तरकीब पर अमल करके वाकई भूत बंगले से बाहर आयी तो बाहर रेगिस्तान में एक ऊंट लिए वही आदमी मुझे इन्तजार में करता मिला | उसने मुझे ऊंट पर बिठाया और पहले तपता  रेगिस्तान, फिर एक उफनती नदी, फिर एक खतरनाक दलदली इलाका, फिर एक बीहड़ जंगल और फिर एक दुर्गम पठार पार करके हम एक इंसानी बस्ती में पहुंचे |  वहां सडकों पर चहल-पहल थी, जगह-जगह उत्सव थे, मेले थे, सभा संगोष्ठियाँ थी; खुबसूरत बाग़ और पार्क थे | मैं उस जीवन में रम गई | लोगों की जिन्दगी की खुशहाली और खुबसूरती में घुलती-मिलती चली गई | मेरे हमदर्द की आँखों का रंग सहानुभूति और सरोकार से बढ़कर दोस्ती का हो गया और फिर न जाने कब उसमे प्यार के रंगीन डोरे तैरने लगे | पर अभी मैं आजादी की अभ्यस्त नहीं हुई थी इसलिए मैं और इन्तजार करना चाहती थी | इस जीवन के हर रंग को जानना चाहती थी और उसे रचने में भी भागीदार बनना चाहती थी | मेरा हमदर्द अक्सर आता था और मुझे उस खुबसूरत बस्ती की खुबसूरत जगहों पर घुमाने ले जाता था | वह रोज अलग-अलग ढंग के पोशाक पहनकर आता था | रोज उसकी अलग-अलग काबिलियत और हुनर के बारे में इतना जानने को मिलता था कि वह कई बार एक एक रहस्य सा लगने लगता था |

    एक दिन हमलोग बस्ती से बाहर एक शांत झील के किनारे एक कुंज की छाया में बैठे थे | शाम ढल चुकी थी | मेरे हमदर्द मुझ से कुछ बात करते हुए मेरा हाथ अपने हाथों में ले लिया और सहलाने लगा | अचानक मैंने कुछ अप्रिय खुरदरा महसूस किया और चौंककर देखने पर पाया कि उसकी अंगुलियाँ और पंजे बाघ के पंजे में तब्दील होते जा रहे हैं, उसकी पोशाक धारीदार खाल बनती जा रही है, चेहरे पर घने बाल निकलते जा रहे हैं और गले से अजीब सी घुरघुराहट निकल रही है | मैं एकदम डर गई | हड़बड़ा कर उठी और हाथ छुड़ाकर बस्ती की ओर  जाने के लिए मुड़ी | लेकिन जहाँ बस्ती था वहां धुल, धुआं और सन्नाटे के सिवा और कुछ भी नहीं था | बदहवास मैं मुड़ी और किसी एक दिशा में भागती चली गई | वह बाघ मेरा पीछा करता रहा; दौड़ते हुए नहीं बस इत्मीनान भरी चाल चलते हुए |

    कई बरस वीरानियों में गुजारने के बाद मैं फिर इंसानी बस्ती तक पहुंच गई | पीछा करता बाघ बस्ती के सीमा पर रुका और फिर वापस लौट गया | ये अलग किस्म की बस्तियां थी | यहाँ सभी लोग तमाम कामों में व्यस्त थे | वे राह चलते लुटेरे गिरोहों के हमले से बस्ती के हिफाजत का उपाय करते थे | वे दुःख शोक और उत्सव साथ में मनाते थे |

   कभी-कभी आपस में बुरी तरह से लड़ते भी थे | इन्हीं बस्तियों में से एक में मैंने अपना पड़ाव डाला | बस्ती के किसी व्यक्ति ने मेरी विशेष मदद करने की कोशिश नहीं की | जरूरत पड़ने पर कोई मदद करने को आ जाता था | कुल मिलाकर सभी किसी न किसी रूप में मददगार होते थे | बस्ती के लोग उस रहस्यमयी बाघ के बारे में जानते थे और भूत बंगले के भीतर भूत बंगले के तिलिस्म को भी जानते थे | धीर-धीरे मैं भी उन्हीं में से एक बनती जा रही थी | लेकिन फिर बस्ती के ठहरे-ठहरे आत्मतुष्ट जीवन से मुझे उब होने लगी | यहाँ लोग सामूहिकता से अधिक निर्भरता के चलते व्यक्तिक विशिष्टता खोकर सपाट चेहरे वाले लोग बन गए थे | कुल मिलाकर वे अच्छे लोग थे पर आसन्न समस्याओं और तात्कालिक हितों से आगे कुछ सोचने में उनकी दिलचस्पी नहीं थी | एक ठहरे हुए लिसलिसे-चिपचिपे रागात्मक परिवेश में जीते चले जाने से आगे वे कुछ सोचते नहीं थे | भूत बंगला और बाघ के रहस्य को पुरी तरह से समझने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी | उनके लिए यह काफी था की वे उस तिलिस्म के बाहर थे | इसलिए मैं उस बस्ती के अपने ठिकाने से चल पडी और बस्ती दर बस्ती सफर जारी रखते हुए नमकसारों, खदानों, खरादों, भटियारखानों और सरायों से गुजरती रही इस दौरान मेरा परिचय ऐसे लोगों से हुआ जो किसी बस्ती में नहीं रहते थे स्थायी तौर पर | वे खानाबदोश लोग थे जो सड़क, खदान, भट्टी, नमकसार......जहां कहीं भी काम मिलता था करते थे, वहीं ठीहा जमाकर रहते थे और काम खत्म होने पर अगले काम की तलाश में आगे की ओर चल देते थे | कई बार मैं ऐसे घुमंतू कारवाँ में शामिल रही और कई बार अकेले ही अपना सफर जारी रखा|

    एक दिन थकान से चूर मैं एक सराय में पहुंची और पहुँचते ही बिस्तर पर ढेर हो गई | जब नींद टूटी तो शाम का समय था मुझे ताज्जुब हुआ | सोई तो मैं रात को थी , कमरे से बाहर आने पर मैंने पाया की यह तो वही भूत बंगले का एक कमरा है जहाँ से भागने के बाद मेरे लम्बे सफर की शुरुआत हुई थी | बदहवास मैं बगल के कमरे में रहनेवाली एक बूढी औरत के पास गई | उसे अपने बरसों की यात्रा के बारे में बताया और फिर पूछा कि मैं यहाँ कैसे पहुँची ? बूढी स्त्री ने अपनी मिचीमिची आंखों से मुझे देखा और फुसफुसा कर कहा यह बात तुम दुबारा फिर कभी मत करना | तुम परसों से सो रही हो और अब बस तुम्हारे ऊपर निगाह रखी जाने लगी है | तुम्हारी दादी इसी तरह सोती थी और उन दिनों की लम्बी यात्रा पर निकल जाती थी जो कभी होता नहीं था | भविष्य के अपने यात्रा के किस्सों को जो भी मिलता था उसे वह सुनाती रहती थी | धीरे-धीरे उसके वे किस्से पूरे भूत बंगले में फैल गए फिर काफी तूफान आया | चीजें काफी उलट-पलट गई | हालात पर बड़ी मुश्किल से काबू पाया गया | तुम्हारी दादी को फिर जंजीरों से जकड़ कर तहखाने में डाल दिया गया और दरवाजे पर एक बड़ा सा ताला डाल दिया गया | कुछ बरस बीतने के बाद फिर ऐसा होने लगा कि ताला अपने-आप नीचे खुलकर गिर जाया करता था फिर वहां दूसरा नया मजबूत ताला लगा दिया जाता था | उन दिनों सभी  पहरेदार भी काफी परेशान थे | हो यह रहा था की ताला हरेक दो दिन पर अपने-आप टूटकर गिर जाता था | इसलिए कह रही हूँ कि ‘तुम अपना सपना याद रखना हर किसी के सामने बयान मत करना |’

     “तुमने मेरी दादी को देखा था ?” मैंने धीमे स्वर में पूछा ? बूढी स्त्री कुछ नहीं बोली उसने रहस्य और प्यार के साथ मुझे देखा और फिर मुस्कुराने लगी |

क्रमशः                


मंगलवार, 12 जून 2018

गुमनाम लड़की की डायरी भाग-1


अकेली स्त्री अगर किसी पर भरोसा करे तो उसे सहज उपलब्ध मान लिया जाता है |


बात 2012 की है,रात के दस बजे मैं नामपल्ली पब्लिक गार्डेन के इंदिरा भवन से विद्यालय के वार्षिकोत्सव समारोह से अपने घर चिन्तल  आर.टी.सी बस से वापस लौट रही थी | बस में यात्री बहुत कम थे ; मैं स्त्रियों के लिए आरक्षित सीट पर बैठी थी हाथ में प्रभा खेतान की आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या तक’ थी | शब्द महीन थे धुंधली रोशनी के वजह से पढ़ तो नहीं पा रही थी , बस यूँ हीं किताब के पन्ने पलट रही थी | कुछ देर बाद आगे सीट पर बैठी लड़की पर मेरा ध्यान गया वह बीच-बीच में लगातार मेरी ओर देख रही थी | अमीरपेट आते आते बस लगभग खाली गिनती के चार यात्री एवं कंडक्टर और ड्राइवर रह गये थे यानि की कुल मिलकर छह | इसी क्रम में वो लड़की मेरे बगल में आकर बैठ गई, उसने मुझसे परिचय किया कुछ औपचारिक बाते हुई; उसने बताया की वह मध्यप्रदेश की रहने वाली है यहाँ फार्मा कम्पनी में कार्यरत है | साथ ही उसने बताया की वह प्रभा खेतान की आत्मकथा पढ़ चुकी है | उसने कहा की उसे हिन्दी साहित्य में गहरी रूचि है क्योंकि उसका पारिवारिक माहौल साहित्य का है | बालानगर में वह लड़की उतर गई | कुछ देर बाद मैंने देखा की उसकी बादामी रंग की डायरी सीट पर छुट गई | डायरी को मैंने उठाकर उल्टा-पलटा लेकिन कहीं कोई नाम-पता या फोन नम्बर दर्ज नहीं था हाँ अलग-अलग पन्नों में कुछ चंद लाइन की प्रविष्टियाँ जरुर दर्ज थी |
पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगा की वह अपनी डायरी जानबूझकर छोड़कर चली गई थी | बातचीत के दौरान मैंने उसे बताया की मैं ‘स्त्री विमर्श’ पर शोध कर रही हूँ इससे सम्बन्धित मेरे आलेख कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं | इस घटना को छह साल बीत गये | मैं उस लड़की और डायरी को भूल भी गई | पिछले महीने पुस्तक की सफाई के दौरान वह डायरी पुन: मेरे हाथ लगी और मैंने यह तय किया की गुमनाम लड़की की इस डायरी के लिखे कुछ अंश को मैं सार्वजनिक करूं :-
·       अकेली स्त्री अगर किसी पर भरोसा करे तो उसे सहज उपलब्ध मान लिया जाता है |
·       नसीहते भी गुलाम और आज्ञाकारी बनाने का उपकरण है |
·       हमदर्दी भी एक षड्यंत्र हो सकता है , या बहेलिये का बिछाया जाल |
·       संरक्षण दिमागी तौर पर गुलाम बनाने का हथकंडा हो सकता है |
·       स्त्री निर्व्याज या नि:स्वार्थ सहायता की अपेक्षा नहीं कर सकती है |
·       बंद समाजो में स्त्री-पुरुष की सामान्य स्वस्थ मैत्री ज्यादातर एक स्वस्थ मिथक होती है;-बहुत दूर की कौड़ी |
·       जो कुछ सिखाता है वह बदले में कुछ चाहता है | जो सिखाने से इनकार करता है वह यह सोचकर कि बदले में क्या मिलेगा ?
·       जिन्होंने उससे मित्रता की उन्होंने भी उसे ‘दो कौड़ी’ का समझा, जो उसका मित्र नहीं बन सके वह उसे ‘दो कौड़ी’ का बताते रहे |
·       जिन्होंने उसे प्यार किया, उन्होंने उसे कुचलकर विजय का आनन्द लिया; - जो उसका प्यार न पा सके उन्होंने उसे कुचलकर प्रतिशोध का आनंद लिया |
·       उनमें भारी बहस चल रही थी कुछ रहे थे जब वह हंसती है तो फंसती है | दूसरों का विचार था की वह फंसती है तो हंसती है |
·       स्त्रियाँ सीधी एकदम नहीं होती | यदि वे सीधी हो तो भेड़िया उन्हें तुरंत खा जाएगा | यदि वह सीधी दिखती है तो मर्द समाज को गच्चा देने के लिए, अपने बचाव के लिए, अपने किसी जटिल रहस्य को छुपाने के लिए या फिर किसी रहस्य का पता लगाने के लिए |
·       पुरुषों के आजादी से उसने इर्ष्या की और खुद थोड़ी सी आजाद होकर बहुत अधिक आजाद के रूप में देखी गई और ढेरों स्त्री-पुरुष के इर्ष्या का आजीवन शिकार होती रही |
·       मध्यवर्ग की आजाद ख्याल की स्त्रियाँ प्राय: अकेलेपन का शिकार होती हैं, उनके ह्रदय बंद, ईर्ष्यादग्ध और अति महत्वाकांक्षी होते हैं | मेहनतकश जमातों की आजाद ख्याल की स्त्रियों में सामूहिकता बोध होता है | वे एकता की कीमत पहचानती हैं क्योंकि एकता ही उन्हें मुक्त करती है |उनके दिल खुले होते हैं क्योंकि वे इर्ष्या और प्रतिशोध में नहीं जीतीं |
·       मध्यवर्गीय स्त्रियों के जीवन और मानस में समस्याएं अधिक अरूप, अमूर्त, एकांगी और अतिरेकी बनकर आती है क्योंकि वे परिप्रेक्ष्य से कटी होती हैं | चीजें लगातार एक सी बनी रहेंगी तो एक प्रचंड प्रतिबद्ध गुलाम मानसिकता वाली नारीवाद वाला मानस तैयार होगा |
·       अंत में यह कि ये सारी बातें पूरा सच नहीं है, आधा सच है | अगर ये पुरी सच होती तो दुनिया जीने लायक नहीं होती |
लेकिन फिर, यह सच है की लगातार लड़ते हुए ही जिया जा सकता है, सजग रहकर ही जिया जा सकता है , और अनेकों अप्रत्यशित मोहभंगों,वायदा खिलाफियों,विश्वासघातों, विफलताओं और पराजयों के लिए यथार्थवादी ढंग से तैयार होकर ही एक आशावादी के रूप में जिया जा सकता है |

क्रमश:
अर्पणा दीप्ति 


    

शुक्रवार, 25 मई 2018

मैं क्यों लिखती हूँ ?-भाग 5




मैं साथ चलना चाहती थी !

उसे कविता पढने और सुनने का शौक है और उसकी आत्मा को संगीत का, कविता दोनों काम कर रही है | वाल्टेयर ने कहा है कि कविता आत्मा का संगीत है , तो यह भी सच है कि संगीत आत्मा का भोजन है | वो चाहती थी कि आत्मा को बेहतरीन भोजन मिले ; इसलिए तो वो बेहतरीन कविता लिखना चाहती थी | उसे कविता की खोज अनवरत रहती थी | कविता न तो रियाज से बनेगी और न पढ़ने से | रियाज से नृत्य में निखार आ सकता है; वाद्य यंत्र काबू में आ सकते हैं और अध्ययन से बौद्धिकता की सीमा बढाई जा सकती है ; लेकिन कविता या तो आएगी या नहीं आएगी | यदि आप चल सकते हैं तो नाच भी सकते हैं किन्तु कविता का सम्बन्ध आत्मा से है, यह ह्रदय का विषय है |
अर्पणा दीप्ति 


कविता की दुनिया बड़ी रहस्यमयी है ! कविता को चोरी किया जा सकता है , परन्तु लिखने की तकनीक को कैसे चोरी करोगे आप | एक कहानी मुझे याद आ रही है- “एकबार की बात है चिड़ियाँ और मधुमक्खी में दोस्ती हुई | चिड़ियाँ ने मधुमक्खी से कहा कि तुम इतना मेहनत करके शहद बनाती हो ; इंसान आता है तुम्हे खदेड़ कर भगा देता है और तुम्हारा शहद चुरा लेता है | मधुमक्खी ने मुस्कान बिखेरते हुए कहा-भले ही इंसान मेरा बनाया हुआ शहद चुरा लेता है ; परन्तु वो आज तक मेरी शहद बनाने की तकनीक को नही चुरा पाया !

वैश्वीकरण और बाजारवाद के इस दौर में मौलिकता का अधोपतन हुआ है | आज भी कुछेक अनछुए गाँव बचे हुए हैं, जहाँ मौलिकता को महसूस किया जा सकता है ; छुआ जा सकता है | गाँव की सबसे खुबसूरत बात यह है कि घर की दहलीज से ही खेतों की सीमा आरम्भ होती है | खेत की सीमारेखा तय करनेवाले मेड़ के पास कुछ हिस्से घास के लिए होते हैं | वसंत के मौसम में इन्ही स्थानों पर आकाशवर्णी तथा पीले फूल खिलते हैं ; रंग-बिरंगी तितलियाँ और भंवरे फूल दर फूल सैर करते हैं | क्या मजाल फूल या तितलियों की कोई पंखुरी टूट जाए ! चिडियों की अलग दुनिया तो झींगुर भरी दोपहरी में अपना तान छेड़े हुए | पहले चिड़िया, फूलो, तितलियों के लिए लिखा फिर दोस्तों के लिए | गाँव छुटा , तालाब बिछड़े, नदियाँ बिछड़ी, दोस्त बिछड़े | इसके किस्से भी डायरी के पन्ने में दर्ज हुए | फिर इधर से नजर उधर गई तो देखा जो लिखा वह तो व्यर्थ था ! कलम तो भूख, दुःख, अन्याय और भ्रष्ट व्यवस्था आदि पर लिखने के लिए बनी हुई है, असली मुद्दे तो ये हैं | उसने मन में एक सुंदर समाज की तस्वीर गढ़ ली ; अब बेचैनी और बढ़ने लगी | उसको हमेशा इस बात की पीड़ा रहती थी कि जो छवि उसके मन में इस समाज की है वो हकीकत क्यों नही बन पा रही है ? अब उसका क्रोध विद्रोह में बदलने लगा | समय बीतता गया- तस्वीर लगभग वैसी की वैसी रह गई | उसे डायरी के पन्नों पर अपनी बात लिखने से थोड़ी राहत मिलती ; तनाव कम होता | एक रात उसकी आँखों में सुनहरे सपने आए | उस रात उसने कुछ नहीं लिखा , बस जो लिखा था उसे नष्ट कर दिया | मन हल्का हुआ नींद गहरी आई |

समय पानी की तरह बहता गया | व्यवस्था में ज्यादा बदलाब नहीं हुआ ; बस चल रहा है जैसे-कैसे | रोटी की व्यवस्था में संघर्ष की दिशा मुड़ गई | बेचैनी बराबर बनी रही | मन उदास भी रहता संगीत सुनना छूटने लगा | सुन्दर चीजें भी आकर्षित करने में असमर्थ होने लगी | पढने-लिखने का अब उसका मन नहीं करता ; मन में युद्ध चलता रहता | विचारों को किससे साझा करे ? अपनी परेशानी में किसे शामिल करे ?

एक दिन चलते-चलते उसका हाथ एक दोस्त ने धीमे से मगर मजबूत पकड़ और अद्भुत गर्माहट के साथ पकड़ा और कहा मैं तुम्हारे साथ चलना चाहता हूँ | उसे लगा कि यह साथ कभी न छुटने वाला है | आँखों में तैरते सपने एक जैसे ही थे ! अचानक आसपास तितलियों का उड़ना और फूलों का खिलना इस बात की पुष्टि कर रहे थे कि कठिन समय आसान होने वाला है | उस रात उसने कविता लिखी सुबह संगीत सुना | दिन में सूरज की रोशनी में छिपे सात रंग देखे | तब से वह पुनः अपनी अनुभूतियों को लिख रही है | हवा के लिए लिख रही है, मिट्टी के लिए लिख रही है, एक दोस्त के लिए लिख रही है ........|
     वो इसलिए भी लिखती है की बहुत सारे अनुभूतियों को व्यक्त नहीं कर पाती थी , बहुत सारी बातों को संकोचवश कह नही पाती थी | छोटी-छोटी बातों की शिकायत तो करती थी , लेकिन अपनी सम्वेदनाओं को व्यक्त नहीं कर पाती थी | इसलिए लिखती थी लिखना उसके लिए संवाद जैसा था ! जाने अनजाने में कि गई गलतियों की माफी के लिए लिखती थी | जो कुछ गलत है उसके विरोध में लिखती थी ; सच्चाई के पक्ष में भी डटकर लिखती थी | वो इसलिए भी लिखती थी ताकि सच ज़िंदा रह सके | दरअसल वह जीना चाहती थी ; अपनी यादों को संजोए रखना चाहती थी कठिन समय में मनोबल ऊँचा बनाए रखना चाहती थी |
 
अंतिम बात यह कि फिर सभी कवि क्यों नही बन जाते ? इसका सीधा उत्तर है कि सभी प्रेम भी तो नहीं करते ! प्लेटो ने ठीक कहा है – “प्रेम के स्पर्श से सभी कवि बन जाते हैं |”  

    






बुधवार, 23 मई 2018

मैं क्यों लिखती हूँ ? भाग-4




अनुभूतियाँ मन के अंत:स्थल में अनेकानेक  प्रतिक्रियाएं और विचलन पैदा करती हैं. संवेदनशील

 व्यक्ति मात्र निजी अनुभवों से ही विचलित नहीं होता अपितु अपने आस-पास घटित होने वाली

 घटनाएं भी उसे उद्वेलित करती हैं. विचलन का विरेचन ही लेखन है. जीवन की निस्सारता, भीड़ में

 भी अकेले रह जाने की कसक, हाथों से सरकती रेत की मानिंद पल-पल छीजती उम्र, रिश्तों में ठगे

 जाने का एहसास…. और ऐसे कितने ही भूले-भटके भाव मन के आकाश पर उमड़-घुमड़ कर छातें हैं

 और बरस जाना चाहते हैं. कहने-सुनने की सीमा से परे जब मौन मुखर होना चाहता है तो लिखना

 अनिवार्य हो जाता है. लेखन स्व से संवाद है, आत्म का साक्षात्कार है.
अर्पणा दीप्ति 


मन के निगूढ़ अंधकार में खदबदाते कहे-अनकहे सत्य शब्दों में ढल कर ही मुक्ति पाते हैं..... और
 मुक्ति भला कौन नहीं चाहता ? यह मुक्ति कामना मनुष्य को कभी जंगलों में भटकाती है, कभी
 धन, पद-प्रतिष्ठा के चंगुल में फांसने का प्रलोभन बन जाती है, कभी देह के मायावी लोक की
 देहलीज़ पर ला खड़ा करती  है और कभी अहसासों को लफ्ज़ों का जामा पहनाने के जोखिम में
 धकेल देती है. कोई नहीं जानता कि मनुष्य अपनी जीवन यात्रा का चुनाव स्वयं करता है अथवा
 कोई अज्ञात लिपि उसके भविष्य का निर्धारण करती है. कोई नहीं जानता कि कुछ बेचैन रूहें
 क्योंकर दर्दजा बन कर जीने के लिये अभिशप्त होती हैं. अपने-पराये, सब का दर्द जिनके भीतर
 पलता है, परवान चढ़ता है और एक दिन ज्वालामुखी सा फूट पड़ता है.... कूल-किनारे तोड़ता हुआ 
 अनुभूतियों से लबालब भरना और बह जाना, फिर से भरने की बाट जोहना और दोनों हाथों से
 उलीच देना, यही तो है लेखन. मैं क्यों लिखती हूँ? यह सवाल कई बार पूछा गया है मुझसे. मैंने खुद
 से भी कई मर्तबा जानना चाहा है कि आखिर लिखना मेरे लिए लाज़िमी क्यों है? इतना ही कह 
सकती हूं कि गहरी उत्कंठा, छटपटाहट, असंतोष, वैचारिक ऊहापोह और मेरे भीतर कसमसाती व्यग्रता
 जब तक शब्दों का जामा ना पहन ले, मुझसे जिया नहीं जाता | ऐसा लगता है कि मेरे अन्तर्मन में मुझसे ही छिपकर बैठा कोई हमसाया जो सांसारिकता में उलझ कर भी कहीं दूर खड़ा साक्षीभाव से
 दुनिया का तमाशा देखा करता है, लिखना उसी रूहपोश की मानसिक खुराक है. जीवन में कई बार
 यह साक्षीभाव छूटा और सालों-साल लिखना भी छूट गया. तब भी मैं ज़िंदा थी, उम्र के कोस भी तय
 हो ही रहे थे मगर हमेशा लगता था कि कुछ है जो कम है. देकार्ते ने कहा था कि ‘मैं सोचता हूँ
 इसलिए मैं हूं’ और मैं कहना चाहती हूँ कि ‘ मैं लिखती हूँ इसलिए मैं हूँ ’

मन

रोजी-रोटी के सवालों से फारिग होकर

कभी सच में मिलना मेरे हमसफ़र!

किसी बाग के कोने में

हरे-भरे छतनार पेड़ तले,

मेरा हाथ थाम कर मुझे

महसूस करना कभी,

मैं आज भी तुम्हारे स्पर्श

की तपिश में पिघलना चाहती हूं।

कानों में फुसफुसा कर

कोई भूली-बिसरी बात कहना
,
मुझे याद दिलाना कि मेरा होना
,
तुम्हारे जिन्दा रहने के लिए कितना जरूरी है !

रोज सुबह एक ही घर की

साझी छत के नीचे
,
अलग-अलग कमरों में बैठे हम,

इतने दूर हो गए हैं

कि कदम भर का फासला

मीलों में बदल गया है।

अपने दिन-रात से दो पल

मेरे लिए चुरा कर
,
कभी सामने आ कर बैठो तो सही,

शायद उस पल मैं तुम्हें बता सकूं

कि एक अर्से से मेरा

तुमसे मिलने का मन है।


         अर्पणा दीप्ति 

सोमवार, 21 मई 2018

मैं क्यों लिखती हूँ-भाग 3




बची रहेगी यह धरा जब तक हम-आप इस पर चहलकदमी करते रहेंगें !

सामान्यत: मैं कविता लिखने से बचती हूँ | साहित्य के इस विधा में पूर्णता का अधिकार मुझे नहीं है  | पर कभी-कभी शब्द घनीभूत होकर जेहन पर इतने भारी हो जाते हैं तब मैं केवल माध्यम बन उन शब्दों को रास्ता भर देती हूँ | अपने आस-पास के समय को जब सम्वेदनशील होकर देखती हूँ , तो शब्दों की पीड़ाओं से भर जाती हूँ | या फिर यूँ कहूँ की शब्द जेहन में खदबदाते(उबलना) हैं जिससे हिय (कलेजा) के भीतर कुछ दाजने (जलना) सा लगता है | उस दाज को जब शब्द का रूप देकर पन्नों पर ढालने लगती हूँ तो मई-जून के तपते रेगिस्तान में पहली बारिश के बाद धीरे से उठती ठंढक महसूस होती है | ये शब्द कभी कहानी, कविता, रिपोर्ताज के आकार  में ढलने लगते हैं लेकिन पीड़ा बहुत निजी होती है वह डायरी में ही उतरती है |

अर्पणा दीप्ति 

अगर खुद से प्रश्न करूँ कि मैं कविता क्यों लिखती हूँ ? तो दो-चार वजह सामने आती है-कई बार तो कविताएँ बेहद निजी पलों की फुसफुसाहट होती है तो कुछ subtext सबटेक्स्ट होती है जिसे कभी सीधे-सीधे बोला या कहा नहीं गया ! कुछ कविताएं हमारे आसपास में फैली अव्यस्था और बेचैनी का प्रतिरूप होती है, तो कुछ सपाट बयानबाजी होती है, जिसमे साधारण मन के सुख-दुःख, खुशी-पीड़ा अभिव्यक्त करती हुई नजर आती है | किसी विदेशी कवि ने कहीं लिखा है कि “ जीवन और मृत्यु के बीच जो भी कुछ हमारा दैनंदिन क्षण होता है, वह भी प्राथमिक तौर पर काव्यात्मक ही होता है|” यानि भीतर और बाहर का सन्धिस्थल, कालहीनता में आंतरिक बोध और क्षणभंगुरता के बाह्य बोध के बीच |

सच कहूँ तो जब कविता पहली बार मोबाईल,लैपटाप,डायरी और रद्दी पैम्पलेट पर उतरती है तो वह रेगिस्तानी गाँव के लिए पहली बारिश से सनी मिट्टी की सौंधी खुशबू लिए होती | फिर धीरे-धीर क्राफ्ट और ड्राफ्ट के ट्रीटमेंट के साथ मेट्रो के सभ्य लोगों जैसी बन जाती है | नाईजेरियन कवि बेन ओकरी ने कहा था कि “हमे उस आवाज की जरूरत है जो हमारी खुशियों से बात कर सकें, हमारे बचपन और निजी राष्ट्रीय स्थितयों के बंधन से बात कर सके वह आवाज जो हमारे संदेह, हमारे भय से बात कर सके ; और उन अकल्पित आयामों से भी जो न केवल हमें मनुष्य बनाते हैं बल्कि हमारा होना भी बनाते हैं |” इस लिए कविता मेरे लिए स्वांत सुखाय पहले है जिसके साथ समाज,देश,और मानवता की चिंताएं सहजता के साथ आती है | कभी भी मैंने उद्देश्य, विचारधारा या वर्ग को ध्यान में रखकर लिखने का प्रयास नहीं किया |

तपते रेगिस्तान में जून की भीषण गर्मी में मटके के ठंढे जल को पीते हुए तृप्ति का अहसास मुसाफिर करता है ठीक वैसा ही अहसास बेचैन करती हुई पीड़ा रात के तीन बजे कागज पर उतरती कविता को देखकर होती है | पुन: यही कहूंगी विपरीत समय में एक सम्वेदनशील मन को यह मासूम कविताएँ ही ज़िंदा रखती है वरना यह क्रूर तपता परिवेश झुलसाने के लिए काफी है |